Maithili Thakur: काशी के घाट पर भाइयों संग पहुंचीं मैथिली ठाकुर, युवाओं के साथ गाए भजन, भक्तिमय हुआ माहौल

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Maithili Thakur: Maithili Thakur arrived at the Kashi ghats with her brothers and sang bhajans with the youth, creating a deeply devotional atmosphere.

BNT Desk : वाराणसी के तुलसी घाट पर गुरुवार की शाम भक्ति और संगीत का खास नजारा देखने को मिला। लोकप्रिय भजन गायिका और बीजेपी विधायक मैथिली ठाकुर अपने दोनों भाइयों के साथ यहां पहुंचीं। इस दौरान वह युवाओं के बीच बैठकर करीब एक घंटे तक भजन गाती रहीं। उनके साथ युवाओं ने भी सुर मिलाए। मैथिली ठाकुर ने अपना लोकप्रिय भजन ‘निमिया की डाढ़’ भी सुनाया, जिससे घाट का माहौल भक्तिमय हो गया।

युवाओं के बीच जमीन पर बैठकर गाए भजन

काशी के गंगा घाटों पर शाम के समय संगीत और भक्ति का माहौल आम है। यहां युवा हारमोनियम, ढोलक और गिटार जैसे वाद्ययंत्रों के साथ गीत-संगीत का आनंद लेते हैं। गुरुवार की शाम तुलसी घाट पर भी कुछ ऐसा ही नजारा था।इसी दौरान मैथिली ठाकुर अपने दोनों भाइयों के साथ वहां पहुंचीं। उन्हें अपने बीच देखकर युवाओं में उत्साह बढ़ गया। मैथिली ने भी बिना किसी औपचारिकता के युवाओं के साथ बैठकर भजन गाना शुरू कर दिया।करीब एक घंटे तक चले इस संगीत सत्र में कई पारंपरिक और भक्तिमय गीत सुनने को मिले। इस दौरान ‘निमिया की डाढ़’ भजन ने भी लोगों का ध्यान खींचा। संगीत, भक्ति और काशी की सांस्कृतिक परंपरा का यह संगम वहां मौजूद लोगों के लिए खास अनुभव बन गया।

तुलसी घाट पर आकर मन को मिली शांति

मीडिया से बातचीत के दौरान मैथिली ठाकुर ने तुलसी घाट को पवित्र और आध्यात्मिक स्थल बताया। उन्होंने कहा कि यहां आकर मन को शांति मिली। काशी के युवाओं के साथ बैठकर गीत गाने का अनुभव भी उनके लिए खास रहा।युवाओं के साथ इस तरह सहज माहौल में संगीत साझा करना उनकी यात्रा का यादगार हिस्सा बन गया। घाट पर हुई इस भजन महफिल में संगीत के साथ-साथ आपसी जुड़ाव और भक्ति की भावना भी देखने को मिली।

गोस्वामी तुलसीदास के नाम पर पड़ा तुलसी घाट का नाम

वाराणसी के तुलसी घाट का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व है। इसका नाम महान संत और कवि गोस्वामी तुलसीदास के नाम पर पड़ा है। तुलसीदास का जीवन और साहित्य भगवान राम की भक्ति से गहराई से जुड़ा रहा है। रामचरितमानस की रचना भी उनकी सबसे प्रसिद्ध साहित्यिक उपलब्धियों में गिनी जाती है।काशी के घाट सदियों से धार्मिक अनुष्ठानों, साधना, संगीत और भक्ति के केंद्र रहे हैं। शाम के समय यहां जुटने वाले युवा गायकी और वाद्ययंत्रों के माध्यम से इस सांस्कृतिक परंपरा को आगे बढ़ाते हैं।ऐसे में मैथिली ठाकुर का युवाओं के साथ बैठकर भजन गाना काशी की इसी संगीत और भक्ति परंपरा की एक खूबसूरत झलक बन गया।

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