BNT Desk: पटना का नालंदा मेडिकल कॉलेज अस्पताल (NMCH), जो प्रदेश के बड़े अस्पतालों में गिना जाता है, आज खुद बीमार नजर आ रहा है। एक हजार से अधिक बेड की क्षमता वाले इस अस्पताल की इमरजेंसी में चिकित्सा व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। आलम यह है कि मरीजों को इलाज के लिए बेड तो दूर, स्ट्रेचर तक नसीब नहीं हो रहा। अस्पताल के गलियारों और रास्तों पर ट्राली लगाकर मरीजों को भर्ती किया जा रहा है, जिससे पूरा अस्पताल एक युद्ध क्षेत्र जैसा नजर आता है।
48 बेड की इमरजेंसी और 60 से ज्यादा मरीज
अस्पताल के आंकड़ों और हकीकत में जमीन-आसमान का फर्क है। जिस इमरजेंसी वार्ड की क्षमता मात्र 48 बेड की है, वहां इस समय 60 से अधिक गंभीर मरीजों को ठूंस-ठूंस कर रखा गया है। जगह इतनी कम है कि एक मरीज दूसरे से सटा हुआ है, जिससे न केवल मरीजों को परेशानी हो रही है, बल्कि डॉक्टरों और नर्सों को चलने-फिरने में भी दिक्कत आ रही है।
जमीन पर इलाज कराने की मजबूरी
अस्पताल में मानवता को शर्मसार करने वाली तस्वीरें आम हो गई हैं:
-
डायरिया पीड़िता संगीता: हनुमान नगर से आई संगीता को बेड नहीं मिला, तो नर्सिंग कक्ष के दरवाजे के पास जमीन पर लिटाकर उसे पानी (IV Fluid) चढ़ाया गया।
-
अपेंडिक्स मरीज सचिन: गोपालगंज से आए युवा मरीज सचिन दर्द से तड़पते रहे, लेकिन स्वजनों की मिन्नतों के बाद भी बेड नहीं मिला। अंततः उन्हें भी रास्ते की जमीन पर लिटाकर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।
भीषण गर्मी और उमस ने बढ़ाई मुसीबत
बिहार में पारा 40 डिग्री के पार है, लेकिन NMCH की इमरजेंसी में राहत का कोई इंतजाम नहीं है। उमस और बेचैन कर देने वाली गर्मी के बीच अस्पताल के अधिकांश एसी (AC) और पंखे खराब पड़े हैं।
-
स्वजन बने ‘हैंड फैन’: मरीज और उनके परिवार घर से छोटे पंखे लाने को मजबूर हैं।
-
रेड जोन भी फेल: जहां सबसे गंभीर मरीजों को रखा जाता है, उस रेड जोन तक के एसी बंद पड़े हैं। डॉक्टर और नर्स के कमरों में भी गर्मी का वही हाल है, जिससे स्वास्थ्य कर्मियों की कार्यक्षमता पर भी असर पड़ रहा है।
संक्रमण का दोहरा खतरा: टीबी वार्ड और इमरजेंसी एक साथ
अस्पताल की सबसे बड़ी लापरवाही यह है कि यहाँ सामान्य गंभीर मरीजों के बीच ही टीबी (Tuberculosis) के मरीजों को भी भर्ती किया जा रहा है।
“टीबी एक संक्रामक बीमारी है, लेकिन यहाँ इमरजेंसी वार्ड में ही टीबी का सेक्शन चल रहा है। इससे वहां मौजूद अन्य मरीजों, उनके स्वजनों और अस्पताल कर्मियों में संक्रमण फैलने का गंभीर खतरा पैदा हो गया है।”
अस्पताल प्रशासन की सफाई: “नया भवन ही एकमात्र समाधान”
इस बदहाली पर जब अस्पताल के उपाधीक्षक डॉ. राजीव रंजन सिन्हा से बात की गई, तो उन्होंने अपनी बेबसी जाहिर की। उनके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
-
मजबूरी का इलाज: उन्होंने स्वीकार किया कि बेड और ट्रॉली फुल होने के कारण जमीन पर इलाज करना उनकी मजबूरी है।
-
इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी: इमरजेंसी में जगह बहुत कम है और मरीजों का दबाव क्षमता से कई गुना अधिक है। इसके लिए नए भवन का निर्माण तुरंत होना आवश्यक है।
-
मरम्मत का दावा: प्रशासन का कहना है कि पंखों और एसी को ठीक कराने का काम चल रहा है।
-
आपातकालीन बैठक: गर्मी और भीड़ को देखते हुए विभागाध्यक्षों (HODs) के साथ जल्द ही एक अहम बैठक बुलाई गई है, जिसमें वैकल्पिक व्यवस्था पर निर्णय लिया जाएगा।