BNT Desk: बिहार की सबसे बड़ी न्यायिक संस्था, पटना हाईकोर्ट, इस समय एक अभूतपूर्व संकट से गुजर रही है। न्याय के मंदिर में जजों और वकीलों के बीच का पुराना तनाव अब खुलकर सामने आ गया है और टकराव की स्थिति ‘आर-पार’ की जंग में तब्दील हो गई है। वकीलों के सबसे बड़े संगठन ‘बार एसोसिएशन’ ने न्यायिक कार्यों के पूर्ण बहिष्कार का कड़ा फैसला लिया है। इस टकराव का सीधा असर बिहार की न्याय व्यवस्था और उन हजारों वादियों (मुकदमेबाजों) पर पड़ने वाला है, जिनकी उम्मीदें 11 मई की सुनवाई पर टिकी थीं।
क्या है विवाद की मुख्य जड़?
पटना हाईकोर्ट में जजों और वकीलों के बीच यह विवाद रातों-रात पैदा नहीं हुआ है। इसके पीछे कई महीनों से सुलग रही नाराजगी है। वकीलों का आरोप है कि कुछ जजों का व्यवहार उनके प्रति मर्यादित नहीं है। बार एसोसिएशन के सदस्यों का कहना है कि सुनवाई के दौरान वकीलों की दलीलों को अनसुना किया जा रहा है और कई बार उनके साथ तीखी भाषा का प्रयोग किया जाता है।
दूसरी ओर, न्यायिक गलियारों में चर्चा है कि केसों के त्वरित निपटारे के दबाव के कारण अनुशासन को लेकर सख्ती बरती जा रही है। इन्हीं ‘व्यवहारगत’ और ‘प्रशासनिक’ मुद्दों ने अब एक बड़े आंदोलन का रूप ले लिया है।
अदालतों में पसरेगा सन्नाटा
बार एसोसिएशन ने एक आपात बैठक बुलाकर सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया है कि 11 मई को कोई भी वकील किसी भी अदालत (Bench) में पेश नहीं होगा।
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कार्य बहिष्कार: वकीलों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे न केवल हाईकोर्ट बल्कि जरूरत पड़ने पर निचली अदालतों में भी इस संदेश को पहुँचाएंगे।
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कोई सुनवाई नहीं: 11 मई के लिए सूचीबद्ध (Listed) किए गए हजारों मामलों की सुनवाई टलना तय है। जमानत याचिकाओं से लेकर महत्वपूर्ण दीवानी और फौजदारी मामलों पर इसका सीधा असर पड़ेगा।
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एकजुटता का प्रदर्शन: एसोसिएशन ने सभी वकीलों से अपील की है कि वे इस दिन कोर्ट परिसर में तो मौजूद रहेंगे, लेकिन काला कोट पहनकर किसी भी न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनेंगे।
न्यायिक व्यवस्था पर पड़ेगा गहरा असर
पटना हाईकोर्ट में पहले से ही लाखों मुकदमे लंबित हैं। ऐसे में एक दिन का भी कार्य बहिष्कार व्यवस्था पर भारी पड़ता है।
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तारीख पर तारीख: जिन लोगों के केस अंतिम चरण में हैं या जिन्हें जमानत की उम्मीद थी, उन्हें अब अगली लंबी तारीख का इंतजार करना होगा।
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कैदियों की परेशानी: जेलों में बंद उन कैदियों को सबसे ज्यादा दिक्कत होगी जिनकी रिहाई की प्रक्रिया 11 मई को पूरी होनी थी।
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आर्थिक बोझ: दूर-दराज के जिलों से पटना आने वाले मुवक्किलों (Clients) को बिना किसी काम के वापस लौटना पड़ेगा, जिससे उनका समय और पैसा दोनों बर्बाद होगा।
बार एसोसिएशन का रुख
बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि वकील न्याय प्रणाली का एक अनिवार्य अंग हैं। यदि उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाई जाएगी, तो वे चुप नहीं बैठेंगे। उन्होंने कहा, “हम न्याय की प्रक्रिया में बाधा नहीं डालना चाहते, लेकिन गरिमापूर्ण माहौल में काम करना हमारा संवैधानिक अधिकार है। जब तक हमारी चिंताओं को गंभीरता से नहीं लिया जाता, हमारा विरोध जारी रहेगा।”
प्रशासन और मुख्य न्यायाधीश की भूमिका
अब सबकी नजरें पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) पर टिकी हैं। आमतौर पर ऐसे विवादों को सुलझाने के लिए ‘फुल कोर्ट मीटिंग’ बुलाई जाती है या बार और बेंच के बीच समन्वय बनाने के लिए एक विशेष समिति का गठन किया जाता है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते वार्ता नहीं हुई, तो यह गतिरोध लंबा खिंच सकता है, जो बिहार की छवि और न्याय प्रणाली दोनों के लिए हानिकारक होगा।
इतिहास में ऐसे विवाद
यह पहली बार नहीं है जब पटना हाईकोर्ट में जज और वकील आमने-सामने आए हैं। अतीत में भी कई बार ड्रेस कोड, जजों के व्यवहार या प्रशासनिक फैसलों को लेकर वकीलों ने हड़ताल की है। हालांकि, इस बार का तनाव काफी गहरा बताया जा रहा है क्योंकि सोशल मीडिया और आंतरिक समूहों में वकीलों का गुस्सा चरम पर है।
समाधान की जरूरत
लोकतंत्र में ‘बार’ (वकील) और ‘बेंच’ (जज) को एक ही रथ के दो पहिए माना जाता है। यदि एक भी पहिया रुक जाए, तो न्याय का रथ आगे नहीं बढ़ सकता। 11 मई का बहिष्कार केवल एक दिन की सांकेतिक हड़ताल नहीं, बल्कि व्यवस्था के भीतर पनप रहे असंतोष का परिणाम है। उम्मीद की जानी चाहिए कि वरिष्ठ जज और बार एसोसिएशन के पदाधिकारी आपसी बातचीत के जरिए इस विवाद को सुलझा लेंगे, ताकि आम जनता को न्याय मिलने में और अधिक देरी न हो।