BNT Desk: बिहार की राजधानी पटना स्थित प्रतिष्ठित इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) इन दिनों एक गंभीर संकट से जूझ रहा है। संस्थान के नर्सिंग कॉलेज की छात्राएं पिछले तीन दिनों से मुख्य द्वार पर धरने पर बैठी हैं। इस आंदोलन ने न केवल कॉलेज प्रशासन की चूलें हिला दी हैं, बल्कि पूरे अस्पताल की स्वास्थ्य सेवाओं को भी प्रभावित कर दिया है। छात्राओं के गंभीर आरोपों ने संस्थान के भीतर चल रहे अनुशासन और व्यवहार पर बड़े सवालिया निशान लगा दिए हैं।
अस्पताल परिसर में अराजकता की स्थिति
आंदोलन के तीसरे दिन स्थिति काफी तनावपूर्ण हो गई है। छात्राओं ने IGIMS के मुख्य प्रवेश द्वार को पूरी तरह से अवरुद्ध कर दिया है। इसका सीधा असर अस्पताल की आपातकालीन सेवाओं पर पड़ रहा है।
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एंबुलेंस की आवाजाही ठप: गेट जाम होने के कारण गंभीर मरीजों को लेकर आने वाली एंबुलेंस को अंदर जाने में भारी मशक्कत करनी पड़ रही है।
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डॉक्टरों और स्टाफ की एंट्री बाधित: अस्पताल के डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ को अंदर जाने से रोका जा रहा है, जिससे ओपीडी और वार्डों में मरीजों का इलाज प्रभावित हो रहा है।
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मरीजों की परेशानी: दूर-दराज से आए मरीज और उनके परिजन गेट के बाहर फंसे हुए हैं, जिससे अस्पताल परिसर में अफरातफरी का माहौल है।
प्रिंसिपल और वाइस प्रिंसिपल पर संगीन आरोप
छात्राओं के इस गुस्से के केंद्र में कॉलेज की प्रिंसिपल अनुजा डैनियल और वाइस प्रिंसिपल रुपाश्री दासगुप्ता हैं। प्रदर्शनकारी छात्राओं ने सीधे तौर पर इन दोनों अधिकारियों पर मानसिक उत्पीड़न का आरोप लगाया है। छात्राओं का कहना है कि:
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दुर्व्यवहार और अपमान: उनके साथ लगातार अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया जाता है।
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परीक्षा में जानबूझकर फेल करना: छात्राओं का आरोप है कि जो भी आवाज उठाता है, उसे जानबूझकर थ्योरी या प्रैक्टिकल परीक्षा में फेल कर दिया जाता है।
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इंटरनल मार्क्स में मनमानी: इंटरनल असेसमेंट के नंबरों का इस्तेमाल छात्राओं को डराने और दबाव बनाने के लिए किया जाता है।
तख्तियों पर उतरा छात्राओं का दर्द
प्रदर्शन स्थल पर छात्राएं हाथों में दर्द और गुस्से से भरी तख्तियां लेकर बैठी हैं। इन तख्तियों पर “मानसिक प्रताड़ना बंद करो”, “हमें न्याय चाहिए” और “कॉलेज है, कोठा नहीं” जैसे कड़े संदेश लिखे हैं। एक छात्रा ने रोते हुए बताया कि कॉलेज का माहौल इतना दमनकारी हो गया है कि कई छात्राएं गंभीर अवसाद (Depression) का शिकार हो चुकी हैं। विरोध करने पर करियर बर्बाद करने की धमकी दी जाती है, जिससे अब तक सब सहती आ रही थीं, लेकिन अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है।
पुरानी जांच रिपोर्ट पर कार्रवाई न होने से बढ़ा आक्रोश
यह पहली बार नहीं है जब छात्राओं ने शिकायत की है। सूत्रों के मुताबिक, पूर्व में भी कुछ छात्राओं ने लिखित शिकायत दर्ज कराई थी, जिसके बाद एक जांच कमेटी का गठन भी हुआ था। लेकिन विडंबना यह है कि उस कमेटी की रिपोर्ट पर प्रशासन ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। इसी प्रशासनिक निष्क्रियता ने आज इस छोटे से विवाद को एक बड़े जनांदोलन में बदल दिया है। गुरुवार को करीब 450 छात्राओं ने कैंपस के अंदर विरोध जताया था, लेकिन सुनवाई न होने पर उन्होंने मुख्य गेट को जाम करने का फैसला किया।
संस्थान की साख पर सवाल:
IGIMS जैसे बड़े सरकारी संस्थान में इस तरह का आरोप लगना कि छात्राओं को मानसिक रूप से इतना तोड़ा गया कि कुछ ‘गंभीर परिणाम’ सामने आए, बेहद चिंताजनक है। यह न केवल कॉलेज प्रबंधन की विफलता है, बल्कि छात्रों की सुरक्षा और उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ भी है। प्रदर्शनकारी छात्राओं का साफ कहना है कि जब तक प्रिंसिपल और वाइस प्रिंसिपल को उनके पद से नहीं हटाया जाता या उन पर कड़ी कार्रवाई नहीं होती, वे पीछे हटने वाली नहीं हैं।
संवाद की कमी और समाधान की तलाश
फिलहाल, IGIMS प्रशासन की ओर से कोई ठोस आधिकारिक बयान या छात्राओं से बातचीत की गंभीर पहल सामने नहीं आई है। पुलिस बल मौके पर तैनात है, लेकिन छात्राएं अपनी मांग पर अडिग हैं। यह आंदोलन अब केवल एक कॉलेज का आंतरिक मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह संस्थागत जवाबदेही (Institutional Accountability) का एक बड़ा सवाल बन गया है। सरकार और स्वास्थ्य विभाग को तुरंत हस्तक्षेप करने की जरूरत है, ताकि मरीजों को राहत मिले और छात्राओं को न्याय।