BNT Desk: पिछले सात दिनों में बिहार से जुड़ी तीन ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जिन्होंने पटना के सचिवालय से लेकर दिल्ली के गलियारों तक हलचल मचा दी है। एक तरफ पलायन कर रहे बिहारी युवाओं की सुरक्षा पर सवाल उठे हैं, तो दूसरी तरफ सरकार ने विकास और कानून-व्यवस्था को लेकर नए ‘मॉडल’ पेश किए हैं। आइए, इन खबरों की गहराई से पड़ताल करते हैं।
क्या ‘बिहारी’ होना गुनाह है?
26 अप्रैल की रात दिल्ली के द्वारका इलाके में 22 साल के डिलीवरी एजेंट पांडव कुमार की हत्या ने पूरे बिहार को झकझोर दिया। खगड़िया का रहने वाला पांडव सिर्फ इसलिए मार दिया गया क्योंकि वह अपने साथियों से अपनी मिट्टी की बोली (बिहारी भाषा) में बात कर रहा था। आरोप है कि दिल्ली पुलिस के एक हेड कांस्टेबल ने ‘बिहारी’ होने पर भद्दी टिप्पणियां कीं और विरोध करने पर पांडव के सीने में गोली मार दी।
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नेताओं की असंवेदनशीलता: मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने इसे केवल एक ‘दुर्भाग्यपूर्ण मौत’ बताया, जिस पर जनता ने तीखी प्रतिक्रिया दी कि यह ‘मौत’ नहीं ‘क्रूर हत्या’ है।
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जीतन राम मांझी का विवादित बयान: केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने यह कहकर घाव पर नमक छिड़क दिया कि “मार दिया तो मार दिया, इसमें कौन बड़ी बात है।” उनके इस बयान की चौतरफा निंदा हो रही है।
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सवाल: क्या 8 लाख का मुआवजा एक जान की कीमत हो सकता है? क्या महानगरों में बिहारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कोई ठोस नीति बनेगी?
लैंड पूलिंग और ट्रैफिक मॉडल
बिहार सरकार ने राज्य के 11 शहरों (पटना, गया, मुजफ्फरपुर आदि) को आधुनिक बनाने के लिए ‘लैंड पूलिंग मॉडल’ अपनाया है। अब सरकार जमीन का अधिग्रहण नहीं करेगी, बल्कि किसानों को ‘पार्टनर’ बनाएगी।
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क्या है खेल?: सरकार किसान की जमीन लेगी, उसे विकसित करेगी और 55% हिस्सा वापस कर देगी। सरकार का तर्क है कि इससे जमीन की कीमत बढ़ेगी। लेकिन पेंच यह है कि छोटे किसानों के पास बहुत कम जमीन बचेगी और वे अपनी ही जमीन को आपातकाल में बेच भी नहीं पाएंगे।
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प्राइवेटाइजेशन का नया तरीका: अब बिहार के 500 चौराहों पर AI कैमरे निजी कंपनियां लगाएंगी। चालान से होने वाली कमाई में इन कंपनियों का हिस्सा होगा। सवाल यह है कि क्या यह सड़क सुरक्षा के लिए है या जनता की जेब खाली कर कंपनियों को फायदा पहुँचाने के लिए?
‘सुशासन’ का नया अवतार:
2005 में नीतीश कुमार ने ‘स्पीडी ट्रायल’ (कानूनी प्रक्रिया) के जरिए अपराधियों को जेल भेजा था। लेकिन अब बिहार में ‘योगी मॉडल’ या कहें कि ‘सम्राट मॉडल’ की एंट्री हो चुकी है। अब फैसला अदालतों के बजाय ‘ऑन द स्पॉट’ हो रहा है।
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भागलपुर और सीवान का उदाहरण: भागलपुर में सरकारी अफसर की हत्या के आरोपी रामधनी यादव को पुलिस मुठभेड़ में ढेर कर दिया गया। वहीं, सीवान में भाजपा नेता के रिश्तेदार की हत्या के महज 9 घंटे के भीतर मुख्य आरोपी के पैरों में गोली मार दी गई (हाफ एनकाउंटर)।
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खतरा क्या है?: जनता इस ‘इंस्टेंट जस्टिस’ पर तालियां तो बजा रही है, लेकिन इतिहास गवाह है कि जब पुलिस खुद ‘जज’ बन जाती है, तो सिस्टम में भ्रष्टाचार और फर्जी एनकाउंटर का खतरा बढ़ जाता है। मुंबई के ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ इसका बड़ा उदाहरण हैं।
समाधान या सिर्फ हेडलाइन?
बिहार आज एक चौराहे पर खड़ा है। एक तरफ विकास की बड़ी-बड़ी टाउनशिप की बातें हैं, तो दूसरी तरफ सड़कों पर गोलियों की गूँज। पलायन करने वाले युवाओं की लाशें लौट रही हैं और राज्य के भीतर खेती की जमीन पर सरकार की नजर है। असली विकास तब होगा जब बिहारी अपनी भाषा बोलने पर गर्व महसूस करे, किसान अपनी जमीन पर सुरक्षित रहे और न्याय कानून की प्रक्रिया से मिले, न कि सिर्फ बंदूक की नली से।
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