BNT Desk: राज्य की उच्च शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने सरकार से लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन तक कई सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला तब और गंभीर हो जाता है, जब राज्य के मुख्यमंत्री को राजभवन बुलाकर उच्च शिक्षा और कॉलेजों की व्यवस्था को लेकर जवाब-तलब किया जाए।राजभवन में मुख्यमंत्री और राज्यपाल के बीच हुई इस मुलाकात को लेकर अब राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में चर्चा तेज है। सवाल यह है कि आखिर उच्च शिक्षा व्यवस्था में ऐसी कौन-सी कमियां सामने आईं, जिन्हें लेकर सरकार को कठघरे में खड़ा होना पड़ रहा है?
कॉलेज हैं, लेकिन पढ़ाई की व्यवस्था पर सवाल
राज्य में बड़ी संख्या में कॉलेज और विश्वविद्यालय संचालित हो रहे हैं। हर साल हजारों छात्र इन संस्थानों में दाखिला लेते हैं। ग्रामीण और छोटे शहरों से आने वाले छात्रों के लिए यही कॉलेज उच्च शिक्षा हासिल करने का सबसे बड़ा माध्यम हैं।लेकिन कई जगहों पर छात्रों की शिकायत है कि कॉलेजों में नियमित पढ़ाई नहीं होती। शिक्षकों की कमी, खाली पद, प्रशासनिक अव्यवस्था और दूसरी समस्याओं के कारण विद्यार्थियों को परेशानी का सामना करना पड़ता है।कहीं शिक्षक नहीं हैं तो कहीं पर्याप्त कक्षाएं नहीं चल रही हैं। कई संस्थानों में परीक्षा और रिजल्ट को लेकर भी छात्रों को लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है।ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि अगर कॉलेज में दाखिला लेने के बाद भी छात्र को नियमित शिक्षा नहीं मिलेगी, तो फिर उच्च शिक्षा की पूरी व्यवस्था का उद्देश्य क्या रह जाएगा?
छात्रों के भविष्य पर पड़ रहा असर
सबसे ज्यादा परेशानी उन छात्रों को होती है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद उच्च शिक्षा हासिल करने का सपना देखते हैं।गांव से आने वाला छात्र परिवार की आर्थिक स्थिति से संघर्ष करके कॉलेज में दाखिला लेता है। अभिभावक उम्मीद करते हैं कि उनका बेटा या बेटी पढ़ाई पूरी करके नौकरी हासिल करेगा और परिवार की स्थिति बदलेगा।लेकिन अगर कॉलेज में पढ़ाई नियमित नहीं हो, परीक्षा समय पर नहीं हो और रिजल्ट के लिए महीनों इंतजार करना पड़े, तो इसका सीधा असर छात्रों के भविष्य पर पड़ता है।एक साल की देरी का मतलब सिर्फ एक साल का नुकसान नहीं है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, नौकरी के अवसर और आगे की पढ़ाई—हर चीज प्रभावित होती है।
विश्वविद्यालयों की व्यवस्था भी सवालों के घेरे में
उच्च शिक्षा व्यवस्था सिर्फ कॉलेजों तक सीमित नहीं है। विश्वविद्यालयों की भूमिका भी इसमें बेहद महत्वपूर्ण है।विश्वविद्यालयों में प्रशासनिक व्यवस्था, परीक्षा संचालन, रिजल्ट जारी करने, शिक्षकों की नियुक्ति और कॉलेजों की निगरानी जैसे कई महत्वपूर्ण काम होते हैं।जब इन स्तरों पर तालमेल की कमी होती है तो उसका खामियाजा सीधे छात्रों को भुगतना पड़ता है।यही वजह है कि उच्च शिक्षा से जुड़े मामलों में सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन की जवाबदेही बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
आखिर मुख्यमंत्री को राजभवन क्यों बुलाना पड़ा?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर ऐसी स्थिति क्यों बनी कि मुख्यमंत्री को राजभवन बुलाकर उच्च शिक्षा व्यवस्था पर चर्चा करनी पड़ी?अगर कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की समस्याएं लगातार सामने आ रही हैं, छात्र आंदोलन कर रहे हैं और व्यवस्था को लेकर शिकायतें बढ़ रही हैं, तो सरकार को इस पर गंभीरता से काम करना होगा।राजभवन से सवाल उठना अपने आप में इस बात का संकेत माना जा सकता है कि उच्च शिक्षा से जुड़े मुद्दे अब सिर्फ छात्रों या विश्वविद्यालयों की समस्या नहीं रह गए हैं, बल्कि यह सरकार और प्रशासन के लिए भी बड़ी चुनौती बन चुके हैं।
सिर्फ बैठक से नहीं बदलेगी तस्वीर
सरकार की ओर से अक्सर समीक्षा बैठकें होती हैं। अधिकारियों को निर्देश दिए जाते हैं। योजनाओं की घोषणा होती है और सुधार के दावे भी किए जाते हैं लेकिन असली सवाल यह है कि इन बैठकों का असर कॉलेजों तक कितना पहुंचता है?छात्रों को भाषण नहीं, शिक्षक चाहिए।उन्हें घोषणाएं नहीं, नियमित कक्षाएं चाहिए।उन्हें आश्वासन नहीं, समय पर परीक्षा और रिजल्ट चाहिए।और सबसे जरूरी बात उन्हें ऐसी व्यवस्था चाहिए, जिसमें उनकी डिग्री सिर्फ कागज का टुकड़ा बनकर न रह जाए, बल्कि उनके भविष्य का रास्ता तैयार करे।
अब सरकार के सामने बड़ी चुनौती
राज्य की उच्च शिक्षा व्यवस्था को सुधारना सरकार के लिए अब बड़ी चुनौती है। शिक्षकों की कमी दूर करने, खाली पदों को भरने, कॉलेजों की आधारभूत सुविधाओं में सुधार करने और विश्वविद्यालयों की प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत है।अगर इन समस्याओं का समय रहते समाधान नहीं हुआ, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान राज्य के युवाओं को होगा।क्योंकि किसी भी राज्य की असली ताकत उसके युवा होते हैं। अगर युवा बेहतर शिक्षा हासिल करेंगे तो रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और राज्य का विकास भी तेज होगा।लेकिन अगर वही युवा कॉलेजों की अव्यवस्था, परीक्षा में देरी और प्रशासनिक परेशानियों में उलझे रहेंगे, तो विकास के बड़े-बड़े दावों का क्या मतलब रह जाएगा?
अब देखना होगा फटकार के बाद क्या बदलता है
राजभवन में हुई बातचीत और उच्च शिक्षा व्यवस्था को लेकर उठ रहे सवालों के बाद अब निगाह सरकार के अगले कदम पर है।क्या कॉलेजों में शिक्षकों की कमी दूर होगी?क्या विश्वविद्यालयों की व्यवस्था सुधरेगी?क्या परीक्षा और रिजल्ट समय पर होंगे?क्या छात्रों की शिकायतों पर तेजी से कार्रवाई होगी?या फिर एक बार बैठक होगी, निर्देश जारी होंगे और कुछ दिनों बाद मामला फिर फाइलों में दब जाएगा?क्योंकि छात्रों को अब सिर्फ आश्वासन नहीं चाहिए। उन्हें जमीन पर बदलाव चाहिए।और अगर राजभवन से मुख्यमंत्री तक को उच्च शिक्षा व्यवस्था को लेकर जवाब देना पड़ रहा है, तो यह सरकार और प्रशासन दोनों के लिए सोचने का समय है।
क्योंकि कॉलेज की खराब व्यवस्था सिर्फ एक विभाग की समस्या नहीं है यह सीधे राज्य के युवाओं के भविष्य का सवाल है।