BNT Desk: भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में इन दिनों कड़वाहट बढ़ती जा रही है। ताज़ा विवाद 1971 के युद्ध और ढाका में भारतीय उच्चायोग की सुरक्षा को लेकर शुरू हुआ है। बुधवार को ढाका की सड़कों पर उस वक्त हंगामा मच गया जब सैकड़ों प्रदर्शनकारी भारतीय उच्चायोग की ओर बढ़ने लगे। हालांकि, पुलिस ने उन्हें बीच रास्ते में ही रोक दिया, लेकिन इस घटना ने दोनों देशों के बीच तनाव को और हवा दे दी है। भारत ने पहले ही ढाका में अपने डिप्लोमेट्स की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जताई है।
क्या भारत अकेले नहीं जीत पाता 1971 की जंग?
इस बीच बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के विदेश मामलों के सलाहकार मोहम्मद तौहीद हुसैन ने एक ऐसा बयान दिया है जिस पर बहस छिड़ गई है। उन्होंने दावा किया कि अगर बांग्लादेशी स्वतंत्रता सेनानियों का साथ नहीं होता, तो भारत के लिए पाकिस्तान को हराना नामुमकिन होता। हुसैन का आरोप है कि भारत 1971 की जीत का पूरा श्रेय खुद ले लेता है और बांग्लादेश के बलिदान को कम आंकता है। उनके अनुसार, कोलकाता में इस जीत को जिस तरह मनाया जाता है, उससे लगता है कि यह सिर्फ भारतीय सेना की जीत थी।
स्थानीय समर्थन और युद्ध की हकीकत
बांग्लादेशी सलाहकार का कहना है कि उनके देश के लड़ाके युद्ध शुरू होने से 6 महीने पहले से ही सक्रिय थे। उन्होंने तर्क दिया कि भारतीय विशेषज्ञों ने भी यह माना है कि अगर स्थानीय स्तर पर पाकिस्तानी सेना को कमजोर नहीं किया जाता, तो भारत को जीत के लिए बहुत लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती। तौहीद हुसैन ने जोर देकर कहा कि बिना बांग्लादेशी सेनानियों के समर्थन के इतनी जल्दी जीत हासिल करना और कम से कम जान-माल का नुकसान होना संभव नहीं था।
ढाका की सड़कों पर भारत विरोधी नारे
दूसरी ओर, ढाका में ‘जुलाई यूनिटी’ के बैनर तले विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं। प्रदर्शनकारी न सिर्फ भारत विरोधी नारे लगा रहे हैं, बल्कि वे शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग भी कर रहे हैं। शेख हसीना पिछले साल हुए छात्र आंदोलन के बाद देश छोड़कर भारत आ गई थीं। स्थिति को देखते हुए भारतीय विदेश मंत्रालय ने दिल्ली में बांग्लादेशी उच्चायुक्त को तलब कर अपनी नाराजगी जाहिर की है। फिलहाल, ढाका में सुरक्षा कड़ी कर दी गई है, लेकिन ज़ुबानी जंग अभी थमने का नाम नहीं ले रही है।