BNT Desk: कभी-कभी खेल में जीत सिर्फ स्कोरबोर्ड पर दर्ज नहीं होती, बल्कि वह वर्षों से चले आ रहे इंतजार को भी खत्म करती है। भारतीय महिला हॉकी के लिए जापान में जीता गया Asian Games गोल्ड भी ऐसी ही कहानी है। 1982 में दिल्ली से शुरू हुआ गोल्ड का सफर 44 साल बाद फिर सुनहरी मंजिल तक पहुंचा। इस दौरान 1998 और 2018 में भारतीय टीम फाइनल तक पहुंची, लेकिन दोनों मौकों पर उसे सिल्वर मेडल से संतोष करना पड़ा। जापान में इस बार भारतीय टीम के सामने डिफेंडिंग चैंपियन चीन था। मुकाबला सिर्फ एक मेडल के लिए नहीं था, बल्कि चार दशक से ज्यादा पुराने इंतजार को खत्म करने का मौका भी था। भारतीय खिलाड़ियों ने इस दबाव के बीच शानदार प्रदर्शन करते हुए 1-0 से जीत दर्ज की और एशिया की चैंपियन बन गईं।
1982 में शुरू हुआ था गोल्ड का सफर
भारतीय महिला हॉकी टीम ने 1982 में दिल्ली में आयोजित एशियन गेम्स में पहली बार गोल्ड मेडल जीता था। उस जीत के बाद टीम से लगातार अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद रही, लेकिन अगली बार गोल्ड तक पहुंचने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा। 1998 में भारतीय टीम एशियन गेम्स के फाइनल में पहुंची, लेकिन उसे सिल्वर मेडल मिला। इसके बाद 2018 में भी टीम ने फाइनल तक का सफर तय किया। एक बार फिर भारतीय खिलाड़ियों को गोल्ड से चूकना पड़ा और सिल्वर के साथ लौटना पड़ा। इस तरह 1982 के बाद हर बड़े टूर्नामेंट में गोल्ड की उम्मीद के साथ उतरने वाली टीम के सामने चार दशक से ज्यादा समय का इंतजार था। जापान में मिली जीत ने इस इंतजार को खत्म कर दिया।
फाइनल में एक गोल ने बदल दी पूरी कहानी
चीन के खिलाफ फाइनल मुकाबले की शुरुआत में भारतीय टीम को दबाव का सामना करना पड़ा। डिफेंडिंग चैंपियन चीन ने शुरुआती समय में भारतीय डिफेंस को चुनौती दी, लेकिन भारतीय खिलाड़ियों ने लगातार अपना संयम बनाए रखा। मुकाबले के 10वें मिनट में लालरेम्सियामी ने भारत को बढ़त दिला दी। उन्होंने शानदार रिवर्स-हिट के जरिए गेंद को गोल में पहुंचाया। उनके लिए यह गोल इसलिए भी खास रहा क्योंकि वह उनका 200वां अंतरराष्ट्रीय मुकाबला था। भारत 1-0 से आगे हुआ तो मुकाबले का रुख बदल गया। इसके बाद भारतीय टीम का फोकस बढ़त को बनाए रखने और चीन के हमलों को रोकने पर रहा।
सविता पूनिया ने बचाया पेनल्टी स्ट्रोक
चीन ने बराबरी के लिए लगातार दबाव बनाया। उसे पेनल्टी स्ट्रोक भी मिला और यह भारत की बढ़त के लिए बड़ा खतरा था। लेकिन भारतीय गोलकीपर सविता पूनिया ने शानदार बचाव करते हुए चीन को बराबरी करने से रोक दिया। सविता के इस बचाव ने भारतीय टीम का आत्मविश्वास बनाए रखा। इसके बाद डिफेंस ने भी चीन के लगातार हमलों का सामना किया। भारतीय खिलाड़ियों ने हर मौके पर गेंद को अपने गोल से दूर रखा।
आखिरी मिनटों में चीन ने गोलकीपर भी हटाया
मुकाबले के आखिरी मिनट बेहद रोमांचक रहे। चीन ने बराबरी के लिए अपना गोलकीपर तक मैदान से हटा दिया और अतिरिक्त आक्रमणकारी खिलाड़ी के साथ भारतीय गोल पर दबाव बनाने की कोशिश की। इसके बावजूद भारतीय डिफेंस नहीं टूटा। खिलाड़ियों ने एकजुट होकर चीन के हर प्रयास को नाकाम किया। आखिरी सीटी बजने तक स्कोर 1-0 ही रहा और भारत ने गोल्ड मेडल अपने नाम कर लिया।
44 साल बाद फिर एशिया की चैंपियन
जापान में मिली यह जीत भारतीय महिला हॉकी के लिए सिर्फ एक गोल्ड मेडल नहीं है। यह 1982 से चले आ रहे इंतजार के खत्म होने की कहानी है। 1998 और 2018 के फाइनल में सिल्वर मेडल मिलने के बाद इस बार भारतीय टीम ने सबसे बड़ी मंजिल हासिल की। इस जीत में एक गोल निर्णायक रहा, लेकिन उस गोल को बचाने में पूरी टीम की भूमिका रही। लालरेम्सियामी के गोल से मिली बढ़त को सविता पूनिया के पेनल्टी स्ट्रोक बचाव और मजबूत डिफेंस ने अंत तक कायम रखा।
वर्ल्ड कप के बाद आत्मविश्वास हुआ और मजबूत
भारतीय महिला हॉकी टीम के लिए 2026 का साल लगातार अच्छे प्रदर्शन वाला रहा है। टीम ने वर्ल्ड कप में पांचवां स्थान हासिल किया, जिसे 1974 के बाद उसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन बताया गया है। वर्ल्ड कप के प्रदर्शन से मिले आत्मविश्वास को भारतीय टीम ने एशियन गेम्स में भी कायम रखा। जापान में चीन जैसी मजबूत टीम के खिलाफ फाइनल जीतकर भारत ने उस आत्मविश्वास को गोल्ड मेडल में बदल दिया। अब इस जीत के साथ टीम के सामने अगली बड़ी चुनौती 2028 लॉस एंजिल्स ओलंपिक है। एशियन गेम्स का गोल्ड जीतने के साथ भारत ने ओलंपिक का सीधा टिकट भी हासिल कर लिया है। 1982 में दिल्ली से शुरू हुई गोल्ड की कहानी 2026 में जापान पहुंचकर फिर सुनहरी हो गई। अब भारतीय महिला हॉकी के लिए अगला अध्याय लॉस एंजिल्स में लिखा जाना है।