बिहार के 1572 स्कूलों के पास जमीन, लेकिन भवन नहीं, 2027 विद्यालय अब भी भूमिहीन; शिक्षा विभाग के सामने बड़ी चुनौती

BNT
By
9 Min Read

BNT Desk: बिहार की सरकारी शिक्षा व्यवस्था में स्कूलों के बुनियादी ढांचे को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल सामने आया है। राज्य में 1572 ऐसे विद्यालय हैं, जहां शिक्षक और बच्चे तो हैं, लेकिन स्कूल का अपना भवन नहीं है। इन विद्यालयों को दूसरे स्कूलों से टैग किया गया है और फिलहाल इन्हीं स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई चल रही है। हालांकि, इन विद्यालयों के पास अपनी जमीन उपलब्ध है, इसलिए शिक्षा विभाग इनके लिए भवन निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की तैयारी कर रहा है।

लेकिन समस्या सिर्फ भवन की कमी तक सीमित नहीं है। राज्य में 2027 ऐसे विद्यालय भी हैं, जिनके पास अपना भवन बनाने के लिए जमीन तक उपलब्ध नहीं है। यानी इन स्कूलों के सामने पहले जमीन की व्यवस्था करने और उसके बाद भवन निर्माण की चुनौती है। शिक्षा विभाग ने ऐसे विद्यालयों की सूची राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग को सौंप दी है और जमीन उपलब्ध कराने की प्रक्रिया शुरू करने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं।

 

1572 स्कूलों के पास जमीन, लेकिन अपना भवन नहीं

शिक्षा विभाग की ओर से जिलों से भवनहीन और भूमिहीन विद्यालयों की अलग-अलग रिपोर्ट मांगी गई थी। रिपोर्ट सामने आने के बाद राज्य में स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं की स्थिति से जुड़ी तस्वीर सामने आई है। आंकड़ों के अनुसार, बिहार में 1572 विद्यालय ऐसे हैं, जिनके पास अपनी जमीन तो है, लेकिन उस जमीन पर स्कूल का भवन नहीं बना है। ऐसे विद्यालयों में शिक्षक और विद्यार्थी मौजूद हैं, लेकिन अपना भवन नहीं होने के कारण उन्हें दूसरे विद्यालयों से टैग किया गया है।

इन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को फिलहाल टैग किए गए विद्यालयों में जाकर पढ़ाई करनी पड़ रही है। इससे एक ही परिसर में अलग-अलग विद्यालयों के संचालन की स्थिति बनती है और स्कूल के नियमित संचालन से जुड़ी चुनौतियां भी सामने आती हैं। इन 1572 विद्यालयों के लिए जमीन उपलब्ध होना एक सकारात्मक पहलू है, क्योंकि भवन निर्माण के लिए जमीन की तलाश करने की जरूरत नहीं होगी। शिक्षा विभाग अब ऐसे स्कूलों के लिए भवन निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की तैयारी में है।

 

पूर्वी चंपारण में सबसे ज्यादा भवनहीन स्कूल

जिलों से मिली रिपोर्ट में पूर्वी चंपारण भवनहीन विद्यालयों की संख्या के मामले में सबसे ऊपर है। जिले में 159 विद्यालय ऐसे हैं, जिनका अपना भवन नहीं है। इसके बाद पूर्णिया में 120 भवनहीन विद्यालय हैं। राजधानी पटना की स्थिति भी पूरी तरह अलग नहीं है। पटना जिले में 73 विद्यालय ऐसे हैं, जो फिलहाल अपने भवन में संचालित नहीं हो रहे हैं। इन विद्यालयों का अपना भवन नहीं होने के कारण उन्हें दूसरे स्कूलों से टैग करके चलाया जा रहा है। इसका सीधा संबंध स्कूल के संचालन और बच्चों की पढ़ाई की व्यवस्था से है। अपना परिसर नहीं होने पर विद्यालय के लिए कक्षाओं, शिक्षकों और विद्यार्थियों के लिए अलग व्यवस्था बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

 

सुपौल में सबसे ज्यादा भूमिहीन विद्यालय

भवनहीन विद्यालयों के बाद सबसे बड़ी चिंता उन स्कूलों को लेकर है, जिनके पास भवन बनाने के लिए जमीन ही उपलब्ध नहीं है। राज्य में ऐसे 2027 विद्यालय हैं। इन भूमिहीन विद्यालयों की संख्या में सुपौल सबसे आगे है। जिले में 147 विद्यालय ऐसे हैं, जिनके पास अपना भवन बनाने के लिए जमीन उपलब्ध नहीं है। इसके बाद पश्चिम चंपारण और कटिहार में 109-109 विद्यालय भूमिहीन हैं। वहीं पटना जिले में भी 69 ऐसे विद्यालय हैं, जिनके पास स्कूल भवन निर्माण के लिए अपनी जमीन नहीं है। इन विद्यालयों के सामने चुनौती दो स्तर की है। पहले इनके लिए जमीन उपलब्ध करानी होगी और उसके बाद उस जमीन पर स्कूल भवन का निर्माण कराया जाएगा। इसलिए इन स्कूलों के मामले में भवन निर्माण की प्रक्रिया जमीन मिलने के बाद ही आगे बढ़ सकती है।

 

प्राथमिक और मध्य विद्यालय ज्यादा प्रभावित

शिक्षा विभाग की सूची के विश्लेषण के अनुसार, भवनहीन और भूमिहीन विद्यालयों में मुख्य रूप से प्राथमिक और मध्य विद्यालय शामिल हैं। वहीं माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालयों में भवन और जमीन की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर बताई गई है। प्राथमिक और मध्य विद्यालय बच्चों की शुरुआती शिक्षा के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। ऐसे में इन विद्यालयों में बुनियादी ढांचे की कमी शिक्षा व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती के रूप में सामने आती है। अपना भवन नहीं होने की स्थिति में बच्चों को दूसरे विद्यालय में पढ़ना पड़ रहा है। वहीं जिन स्कूलों के पास जमीन भी नहीं है, उनके लिए स्थायी व्यवस्था तैयार करने में जमीन की उपलब्धता सबसे पहली जरूरत बन जाती है।

 

भूमिहीन स्कूलों को जमीन देने की तैयारी

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि 2027 भूमिहीन विद्यालयों के लिए जमीन की व्यवस्था कैसे होगी। शिक्षा विभाग ने इन विद्यालयों की सूची राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग को सौंप दी है। शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी के मुताबिक, भूमिहीन विद्यालयों के लिए जमीन उपलब्ध कराने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए नोडल अधिकारी नियुक्त किए गए हैं। इसके साथ ही सभी जिलाधिकारियों को भी पत्र भेजा गया है। सरकार की ओर से बताया गया है कि जैसे-जैसे इन विद्यालयों के लिए जमीन उपलब्ध होगी, वैसे-वैसे भवन निर्माण की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। इसका मतलब यह है कि भूमिहीन विद्यालयों के लिए पहले जमीन की समस्या का समाधान करना होगा और उसके बाद स्कूल भवन निर्माण की दिशा में काम आगे बढ़ेगा।

 

भवन निर्माण के लिए राशि की कमी नहीं होने देने की बात

शिक्षा मंत्री के अनुसार, स्कूल भवनों के निर्माण के लिए राशि की कमी नहीं होने दी जाएगी। फिलहाल जिलों से जमीन की उपलब्धता को लेकर रिपोर्ट मांगी गई है। रिपोर्ट मिलने के बाद भवन निर्माण को लेकर आगे की कार्रवाई की जाएगी। इस व्यवस्था में 1572 भवनहीन लेकिन भूमियुक्त विद्यालयों और 2027 भूमिहीन विद्यालयों के लिए अलग-अलग स्तर पर काम करना होगा। जिन स्कूलों के पास जमीन पहले से उपलब्ध है, उनके भवन निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सकती है। वहीं भूमिहीन विद्यालयों के लिए जमीन उपलब्ध कराने के बाद ही स्थायी भवन निर्माण की दिशा में काम संभव होगा।

 

अब जमीन से भवन तक पहुंचने की चुनौती

बिहार में सरकारी स्कूलों के बुनियादी ढांचे को लेकर सामने आए ये आंकड़े बताते हैं कि चुनौती सिर्फ स्कूल भवन बनाने तक सीमित नहीं है। एक तरफ 1572 विद्यालय ऐसे हैं, जिनके पास जमीन मौजूद है लेकिन भवन नहीं है, जबकि दूसरी तरफ 2027 विद्यालयों के पास जमीन ही उपलब्ध नहीं है। अब शिक्षा विभाग के सामने दोनों स्तरों पर काम आगे बढ़ाने की चुनौती है। भूमिहीन विद्यालयों के लिए जमीन उपलब्ध कराने के साथ-साथ जमीन वाले भवनहीन विद्यालयों में निर्माण शुरू करना होगा।

फिलहाल सरकार की ओर से जमीन उपलब्ध कराने और भवन निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की बात कही गई है। लेकिन इन विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों को अपने स्कूल का स्थायी भवन कब मिलेगा, यह प्रक्रिया की गति और जमीन की उपलब्धता पर निर्भर करेगा। आने वाले समय में जिलों से मिलने वाली रिपोर्ट और उसके आधार पर होने वाली कार्रवाई से यह स्पष्ट होगा कि इन विद्यालयों के लिए स्थायी भवन निर्माण कब तक शुरू हो पाता है।

Share This Article