पटना: देश की राजनीति में बिहार हमेशा से बदलाव की प्रयोगशाला रहा है। बिहार में जब भी कोई बड़ा राजनीतिक उलटफेर होता है, उसकी गूंज सिर्फ पटना तक सीमित नहीं रहती, बल्कि दिल्ली से लेकर दूसरे राज्यों तक सियासी समीकरण बदलने लगते हैं।
अब एक बार फिर बिहार की राजनीति चर्चा के केंद्र में है। सवाल उठ रहा है कि क्या महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल के बाद बीजेपी का अगला बड़ा राजनीतिक दांव बिहार हो सकता है?
बीजेपी ने पिछले कुछ वर्षों में कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों के प्रभाव को चुनौती दी है। महाराष्ट्र हो या पश्चिम बंगाल, बीजेपी लगातार अपने संगठन को मजबूत करने और क्षेत्रीय पार्टियों के प्रभाव को कम करने की रणनीति पर काम करती दिखी है।
अब नजर बिहार पर है।
क्या क्षेत्रीय दलों की बैसाखी हटाना चाहती है बीजेपी?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बीजेपी अब सिर्फ गठबंधन के सहारे राज्यों में आगे नहीं बढ़ना चाहती। पार्टी ऐसे राज्यों में अपनी स्वतंत्र ताकत बनाना चाहती है, जहां सरकार बनाने के लिए उसे किसी दूसरे दल पर निर्भर न रहना पड़े।
बिहार में बीजेपी लंबे समय तक क्षेत्रीय दलों के सहारे सत्ता की राजनीति करती रही है। कभी जनता दल यूनाइटेड का साथ मिला तो कभी जीतन राम मांझी और चिराग पासवान जैसे नेताओं की पार्टियों का।लेकिन अब बीजेपी के बढ़ते जनाधार ने पार्टी को नई रणनीति बनाने का मौका दिया है।
नीतीश कुमार के कमजोर होने की चर्चा
बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार की भूमिका सबसे अहम रही है। उन्होंने लंबे समय तक अलग-अलग सामाजिक समीकरणों को साधकर अपनी पकड़ बनाए रखी।लेकिन बदलते राजनीतिक माहौल में सवाल उठ रहे हैं कि क्या नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू पहले जैसी मजबूत स्थिति में है?राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि उम्र और स्वास्थ्य को देखते हुए नीतीश कुमार के बाद जेडीयू का भविष्य क्या होगा, यह बड़ा सवाल बन चुका है।पार्टी के अंदर गुटबाजी और नेताओं के बीच मतभेद की खबरें भी समय-समय पर सामने आती रही हैं।
2024 फ्लोर टेस्ट के बाद बदला समीकरण
बीजेपी के बढ़ते प्रभाव का उदाहरण 2024 के फ्लोर टेस्ट के दौरान भी देखने को मिला।नीतीश सरकार के बहुमत परीक्षण के दौरान समर्थन करने वाले कई विधायकों को बाद में सम्मान मिला।इनमें संगीता देवी, भरत बिंद, अनंत सिंह, चेतन आनंद, मुरारी प्रसाद गौतम जैसे नाम शामिल रहे।राजद से बीजेपी में आए सूर्यगढ़ा के विधायक रहे प्रहलाद यादव को भी सम्मान मिला और उन्हें बिहार सरकार की ओर से राज्य उप-मंत्री का दर्जा दिया गया।
इस घटनाक्रम ने बिहार की राजनीति में नई चर्चा शुरू कर दी।
क्या देश में क्षेत्रीय दल कमजोर हो रहे हैं?ये सवाल सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं है।महाराष्ट्र में क्षेत्रीय राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला।पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने खुद को मजबूत विपक्ष के तौर पर खड़ा किया।
अब सवाल है कि क्या बिहार में भी वही कहानी दोहराई जाएगी?
बिहार में जेडीयू, आरजेडी और अन्य क्षेत्रीय दलों की राजनीति जातीय और सामाजिक समीकरणों पर आधारित रही है।
ऐसे में बीजेपी के लिए चुनौती भी बड़ी है लोजपा और छोटे दलों की चिंता चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) भी बिहार की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका रखती है।
लेकिन लोजपा में पहले भी बड़ी टूट हो चुकी है।
साल 2021 में पार्टी के 6 में से 5 लोकसभा सांसदों ने अलग गुट बना लिया था।
पशुपति कुमार पारस, प्रिंस राज, वीणा देवी, चंदन सिंह और महबूब अली कैसर ने चिराग पासवान से अलग रास्ता चुना था।
इसके बाद पशुपति पारस को केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह भी मिली थी।
साल 2005 में भी लोजपा विधायक दल में टूट हुई थी।
राजद पर भी नजर
वहीं राजद के चार लोकसभा सांसदों को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं होती रही हैं।राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बीजेपी उन नेताओं पर नजर रख सकती है जिनका राजनीतिक झुकाव भविष्य में बदल सकता है।हालांकि राजनीति में अंतिम फैसला जनता करती है।बिहार की राजनीति का अगला अध्यायबिहार में आने वाले समय में सिर्फ चुनाव नहीं होंगे, बल्कि राजनीतिक विरासत की लड़ाई भी होगी।
क्या बीजेपी बिहार में अपनी स्वतंत्र ताकत बना पाएगी?
क्या क्षेत्रीय दल अपनी पकड़ बचा पाएंगे?
क्या नीतीश कुमार के बाद जेडीयू मजबूत रह पाएगी?
इन सभी सवालों के जवाब आने वाला समय देगा।
लेकिन इतना तय है कि बिहार की राजनीति एक बार फिर बड़े बदलाव के दौर में है…
और बिहार से उठने वाली राजनीतिक हवा का असर पूरे देश पर पड़ेगा।