BNT Desk: बिहार के वैशाली जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने समाज की सदियों पुरानी रूढ़िवादी सोच को झकझोर कर रख दिया है। अक्सर यह माना जाता है कि पिता की अर्थी को कंधा देना या मुखाग्नि देना केवल पुत्र का अधिकार है, लेकिन वैशाली के नया टोला गांव की पांच बेटियों ने इस धारणा को बदलते हुए अपने पिता का अंतिम संस्कार पूरे रीति-रिवाज के साथ संपन्न किया।
असमंजस के बीच बेटियों ने संभाली कमान
वैशाली थाना क्षेत्र के नया टोला निवासी तारिणी प्रसाद सिंह का हाल ही में निधन हो गया। उनके परिवार में पत्नी ललिता देवी और पांच बेटियां— पूनम सिंह, नीलम सिंह, माधुरी, माला और चांदनी हैं। तारिणी प्रसाद का कोई पुत्र नहीं था। उनके निधन के बाद गांव और परिवार में इस बात को लेकर असमंजस की स्थिति बन गई कि अंतिम संस्कार की रस्मों को कौन निभाएगा और अर्थी को कंधा कौन देगा।
परंपरागत सोच रखने वाले कुछ लोगों के मन में संशय था, लेकिन तारिणी प्रसाद की पांचों बेटियों ने इस असमंजस को एक पल में खत्म कर दिया। उन्होंने तय किया कि जिस पिता ने उन्हें पाल-पोसकर बड़ा किया, उनके अंतिम सफर की जिम्मेदारी भी वही उठाएंगी।
जब बेटियों के कंधों पर निकला पिता का अंतिम सफर
जैसे ही घर से अर्थी निकली, पांचों बेटियों ने उसे अपने कंधों पर उठा लिया। श्मशान घाट तक के सफर में बेटियां न केवल पिता का बोझ उठाए हुए थीं, बल्कि समाज की उस सोच को भी चुनौती दे रही थीं जो बेटियों को बेटों से कमतर आंकती है।
यह दृश्य देखकर वहां मौजूद ग्रामीणों की आंखें नम हो गईं। गांव के बुजुर्गों ने भी माना कि फर्ज निभाने के मामले में ये बेटियां किसी बेटे से कम नहीं हैं।
“जब औरत भगवान राम को जन्म दे सकती है, तो कंधा क्यों नहीं?”
तारिणी प्रसाद की बेटी माधुरी सिंह ने इस भावुक क्षण में समाज के प्रति अपना आक्रोश और तर्क दोनों साझा किए। उन्होंने कहा, “लोग लड़कियों को कमजोर समझते हैं। समाज में आज भी यह धारणा है कि वंश सिर्फ लड़कों से चलता है और लड़कियां कुछ नहीं कर सकतीं। लेकिन लोग यह भूल जाते हैं कि लड़कों को जन्म देने वाली भी एक औरत ही होती है।”
माधुरी ने आगे तर्क दिया, “अगर एक महिला भगवान राम को जन्म दे सकती है, तो वह अपने पिता की अर्थी को कंधा क्यों नहीं दे सकती? हमारे पिताजी ने हमें पढ़ाया-लिखाया, सक्षम बनाया और अपने सारे कर्तव्य निभाए। आज हमारा समय था कि हम अपना फर्ज निभाएं।”
समाज के लिए एक आईना: भेदभाव खत्म करने की अपील
इन पांचों बहनों का यह कदम केवल एक अंतिम संस्कार नहीं, बल्कि समाज में व्याप्त लिंग-भेद (Gender Discrimination) के खिलाफ एक मूक क्रांति है। उनका उद्देश्य उन परिवारों को हिम्मत देना है जहाँ केवल बेटियां हैं।
माधुरी ने बताया कि उन्होंने यह फैसला इसलिए लिया ताकि समाज को आईना दिखाया जा सके। “हम यह साबित करना चाहते थे कि बेटी कभी बोझ नहीं होती। लड़का हो या लड़की, दोनों को बराबर का सम्मान मिलना चाहिए। अगर दिल में जज्बा हो, तो बेटियां हर वो काम कर सकती हैं जो समाज ने केवल पुरुषों के लिए आरक्षित कर रखा है।”
बदलाव की बयार
नया टोला की इन बेटियों ने यह साबित कर दिया कि संस्कार और फर्ज का जेंडर से कोई लेना-देना नहीं होता। उनकी इस हिम्मत की चर्चा अब पूरे वैशाली जिले और सोशल मीडिया पर हो रही है। यह घटना उन लोगों के लिए एक बड़ी प्रेरणा है जो आज भी बेटे की चाह में बेटियों को कम आंकते हैं।