BNT Desk: पटना मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (PMCH) के तत्कालीन प्रभारी प्राचार्य डॉ. नरेंद्र प्रताप सिंह को पद से हटाए जाने की घटना अब एक बड़े विवाद का रूप ले चुकी है। स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार द्वारा की गई प्रशासनिक कार्रवाई के बाद अब यह मामला केवल निलंबन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें भ्रष्टाचार के आरोपों और भारी मुआवजे की मांग ने इसे एक गंभीर कानूनी और राजनीतिक मोड़ दे दिया है।
शिकायतकर्ता का दावा
बुद्ध कॉलोनी निवासी सामाजिक कार्यकर्ता प्रभाष चंद्र शर्मा ने इस कार्रवाई को पूरी तरह अनुचित बताते हुए राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC), प्रधानमंत्री कार्यालय, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) को पत्र लिखकर निष्पक्ष जांच की मांग की है।
शिकायत में लगाए गए प्रमुख आरोप:
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उपकरणों की हेराफेरी: दावा किया गया है कि डॉ. सिंह ने जनवरी 2026 में कार्यभार संभालने के बाद सुपर स्पेशियलिटी बिल्डिंग में करोड़ों के महंगे चिकित्सा उपकरणों की अवैध जमाखोरी और हेराफेरी का पर्दाफाश किया था।
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सुनियोजित कार्रवाई: शिकायतकर्ता का आरोप है कि स्वास्थ्य मंत्री का दौरा पहले से तय एक ‘रणनीति’ थी। बिना किसी कारण बताओ नोटिस या विभागीय जांच के मात्र 24 घंटे के भीतर डॉ. सिंह को हटाना तानाशाही और विभागीय प्रताड़ना का हिस्सा है।
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बहाली और मुआवजे की मांग: पत्र में डॉ. सिंह की 24 घंटे के भीतर सम्मानजनक बहाली, स्वास्थ्य मंत्री से सार्वजनिक माफी और डॉ. सिंह की छवि धूमिल होने के एवज में 100 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग की गई है।
घटना का घटनाक्रम
विवाद की शुरुआत 23 जून 2026 को हुई, जब स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार रेडियोलॉजी विभाग में नई सुविधाओं के उद्घाटन के लिए पीएमसीएच पहुंचे थे। मंत्री के अनुसार:
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निरीक्षण के दौरान तत्कालीन प्रभारी प्राचार्य डॉ. सिंह अपने कार्यालय में मौजूद नहीं थे।
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फोन करने के बावजूद उनसे संपर्क नहीं हो सका।
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इस गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार और ड्यूटी से अनुपस्थिति पर नाराजगी जताते हुए तत्काल प्रभाव से विभागीय कार्रवाई की गई।
डॉ. नरेंद्र प्रताप सिंह का पक्ष
वहीं, डॉ. नरेंद्र प्रताप सिंह ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से न्याय की गुहार लगाई है। उन्होंने कहा है कि उन्हें अपना पक्ष रखने का कोई अवसर नहीं दिया गया और ईमानदारी से काम करने की सजा उन्हें प्रताड़ना के रूप में मिल रही है। उनका तर्क है कि एक अधिकारी के रूप में उनकी गरिमा और अधिकारों की रक्षा होनी चाहिए।
वर्तमान स्थिति
फिलहाल यह मामला जांच के दायरे में है। जहाँ एक ओर शिकायतकर्ता और डॉ. सिंह ने भ्रष्टाचार और दुर्भावना का आरोप लगाया है, वहीं दूसरी ओर सरकार की ओर से अभी तक इन गंभीर आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।
यह घटना बिहार के प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है। स्वास्थ्य विभाग के भीतर का यह घमासान अब यह तय करेगा कि क्या यह केवल कार्य में लापरवाही का मामला है या इसके पीछे वाकई कोई बड़ा भ्रष्टाचार का खेल छिपा था, जिसका खुलासा डॉ. सिंह ने करने की कोशिश की थी।