कर्नाटक के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में NRI कोटा पर बवाल, MBBS सीटों को लेकर सियासी घमासान

कर्नाटक सरकार द्वारा सरकारी मेडिकल कॉलेजों में MBBS के लिए NRI कोटा लागू करने पर विवाद गहराया है। भारी फीस अंतर और स्थानीय छात्रों को नुकसान के आरोप लगे हैं। विपक्ष इसे सीटें बेचने का मामला बता रहा है, जबकि सरकार फैसले का बचाव कर रही है।

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BNT Desk: कर्नाटक के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस (MBBS) की सीटों को लेकर इन दिनों जबरदस्त विवाद खड़ा हो गया है। राज्य सरकार ने इस साल से सरकारी कॉलेजों में ‘एनआरआई कोटा’ (NRI Quota) शामिल करने का फैसला किया है, जिसकी चौतरफा आलोचना हो रही है। विपक्ष और शिक्षा विशेषज्ञों का सीधा आरोप है कि सरकार ने होनहार और गरीब बच्चों के हक की सस्ती सीटों को मोटी रकम के बदले रईसों के लिए रिजर्व कर दिया है। नीट यूजी 2025 की काउंसलिंग के दौरान इस फैसले ने तब और तूल पकड़ लिया जब आंकड़े सामने आए।

64 हजार बनाम 25 लाख का बड़ा अंतर

इस पूरे विवाद की जड़ फीस का भारी अंतर है। सामान्य तौर पर एक सरकारी मेडिकल सीट की सालाना फीस लगभग 64,350 रुपये होती है। लेकिन सरकार ने एनआरआई कोटे की सीटों के लिए इसे बढ़ाकर 25 लाख रुपये सालाना कर दिया है। हैरान करने वाली बात यह है कि इस साल कोटे के तहत तय की गई 57 सीटों में से केवल 18 सीटों पर ही असली एनआरआई उम्मीदवारों ने दाखिला लिया। बची हुई 39 सीटें उन स्थानीय छात्रों को दे दी गईं जो 25 लाख रुपये की भारी-भरकम फीस चुकाने को तैयार थे। आलोचकों का कहना है कि यह मेधावी कन्नड़ छात्रों के साथ बड़ा धोखा है।

विधानसभा में गूंजा ‘सीटें बेचने’ का मुद्दा

भाजपा विधायक वाई. भरत शेट्टी ने इस मुद्दे को विधानसभा में उठाते हुए सरकार पर कड़े प्रहार किए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत के इतिहास में पहली बार कर्नाटक सरकार सरकारी मेडिकल सीटों को खुलेआम “बेच” रही है। उनका तर्क है कि जो सीटें डेढ़ लाख रुपये के अंदर किसी काबिल छात्र को मिलनी चाहिए थीं, उन्हें सरकार मुनाफे के लिए इस्तेमाल कर रही है। साथ ही, उन्होंने राजीव गांधी यूनिवर्सिटी (RGUHS) के 500 करोड़ रुपये के फंड के इस्तेमाल पर भी सवाल उठाए हैं, जिसे कथित तौर पर दूसरे कॉलेजों के लिए निकाला जा रहा है।

सरकार की दलील और बुनियादी ढांचे का तर्क

दूसरी तरफ, सरकारी अधिकारियों ने इस नीति का बचाव करते हुए कहा है कि गुजरात और राजस्थान जैसे राज्यों में भी इसी तरह का मॉडल अपनाया जा रहा है। सरकार का कहना है कि इस कोटे से मिलने वाले पैसे का उपयोग मेडिकल कॉलेजों के बुनियादी ढांचे को सुधारने, नई सुविधाएं देने और छात्र कल्याण के लिए किया जाएगा। अधिकारियों का दावा है कि सीटों की संख्या बढ़ाए जाने से सामान्य श्रेणी के छात्रों को कोई नुकसान नहीं होगा। हालांकि, आम जनता के बीच अब भी यह सवाल बरकरार है कि क्या शिक्षा का बाजारीकरण भविष्य के डॉक्टरों की गुणवत्ता पर असर नहीं डालेगा?

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