खगड़िया: जान जोखिम में डाल नाव से कोसी पार करने को मजबूर स्कूली बच्चे

खगड़िया की रोहियार पंचायत में मिडल स्कूल न होने से बंगलिया गांव के सैकड़ों बच्चे हर दिन नाव से उफनती कोसी नदी पार कर स्कूल जाते हैं। ग्रामीण लंबे समय से गांव के प्राथमिक विद्यालय को उत्क्रमित करने की मांग कर रहे हैं, ताकि मासूमों को जानलेवा सफर न करना पड़े।

BNT
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बिहार के खगड़िया जिले के चौथम प्रखंड से एक ऐसी तस्वीर सामने आ रही है जो डिजिटल इंडिया के दौर में शिक्षा व्यवस्था की पोल खोलती है। रोहियार पंचायत के बंगलिया गांव के सैकड़ों बच्चे हर दिन अपनी जान जोखिम में डालकर, नाव के सहारे उफनती कोसी नदी पार कर स्कूल जाने को मजबूर हैं। गांव में मध्य विद्यालय (मिडल स्कूल) नहीं होने के कारण कक्षा 6 से 8 तक की पढ़ाई के लिए बच्चों को 6 से 8 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है और फिर छोटी नावों के जरिए नदी पार करनी पड़ती है।

कोसी की लहरों के बीच बचपन: जान का जोखिम और पढ़ाई की मजबूरी

बंगलिया गांव की आबादी पंचायत की कुल आबादी की लगभग आधी है, लेकिन यहाँ सिर्फ चार प्राथमिक विद्यालय हैं। हर साल करीब 300 छात्र प्राथमिक शिक्षा पूरी कर मध्य विद्यालय बलकुंडा में दाखिला लेते हैं। यहाँ जाने का रास्ता बेहद कठिन है। कक्षा 7 के छात्र प्रियांशु और कक्षा 6 की कल्पना बताती हैं कि उन्हें घने जंगलों और नदी के किनारे से होकर गुजरना पड़ता है, जहाँ हमेशा डर बना रहता है। बारिश के दिनों में जब कोसी का जलस्तर बढ़ता है, तो छोटी नावें लहरों में बहने लगती हैं, जिससे डर के मारे कई बच्चे स्कूल ही नहीं जा पाते।

स्कूल जाने के नाम पर मौत से सामना, पहले भी हो चुके हैं हादसे

स्थानीय ग्रामीणों और छात्रों का कहना है कि नदी पार करने के दौरान पहले भी डूबने से कई बच्चों की मौत हो चुकी है। बावजूद इसके, प्रशासन की नींद नहीं टूट रही है। सावन-भादो के महीने में खतरा और बढ़ जाता है क्योंकि कोसी नदी अपने पूरे उफान पर होती है। मध्य विद्यालय बलकुंडा के प्रधानाध्यापक अनिल कुमार भी स्वीकार करते हैं कि बंगलिया के बच्चे जान जोखिम में डालकर आते हैं, जिस कारण उनकी उपस्थिति कम रहती है और वे कई सरकारी योजनाओं के लाभ से भी वंचित रह जाते हैं।

सालों से लंबित है स्कूल के अपग्रेडेशन की मांग

ग्रामीण रविश कुमार और सामाजिक कार्यकर्ता उमीकांत सिंह ने बताया कि बंगलिया के प्राथमिक विद्यालय (कात्यायनी स्थान) के पास पर्याप्त जमीन और भवन उपलब्ध है। इसे ‘उत्क्रमित मध्य विद्यालय’ बनाने के लिए डीएम से लेकर शिक्षा विभाग तक को कई बार लिखित आवेदन दिए गए, लेकिन नतीजा सिफर रहा। वार्ड सदस्य प्रतिनिधि नकुल सिंह का कहना है कि आजादी के इतने साल बाद भी यहाँ के बच्चों को बुनियादी शिक्षा के लिए अपनी जान दांव पर लगानी पड़ रही है।

प्रशासन का आश्वासन और भविष्य की चुनौती

इस मामले पर चौथम प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी मनोज श्रीवास्तव ने माना कि बच्चों को परेशानी हो रही है और वे इस मुद्दे को वरीय अधिकारियों के सामने रखेंगे। वहीं स्थानीय विधायक ने भी आश्वासन तो दिया है, लेकिन धरातल पर अब तक कोई काम शुरू नहीं हुआ है। अब देखना यह है कि क्या सरकार इन मासूमों की पुकार सुनेगी या फिर किसी बड़े हादसे के बाद ही प्रशासन की नींद खुलेगी।

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