बिहार: 283 अभ्यर्थियों का सपना टूटा, पटना हाईकोर्ट ने पलटा एकलपीठ का फैसला, नियुक्ति पर लगाई रोक

BiharNewsAuthor
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BNT Desk: बिहार पुलिस में दारोगा (सब-इंस्पेक्टर) बनने की आस लगाए बैठे 283 अभ्यर्थियों को पटना हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। कोर्ट की डबल बेंच ने इन अभ्यर्थियों की नियुक्ति प्रक्रिया पर रोक लगाते हुए एकलपीठ (Single Bench) के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें उन्हें बहाल करने का निर्देश दिया गया था।

मंगलवार, 28 अप्रैल 2026 को जस्टिस संगम कुमार साहू और जस्टिस हरीश कुमार की खंडपीठ ने राज्य सरकार की अपील पर सुनवाई करते हुए 42 पन्नों का विस्तृत फैसला सुनाया। इस फैसले के बाद दशकों पुराने इस भर्ती विवाद में एक नया मोड़ आ गया है।

क्या है पूरा मामला?

यह कानूनी लड़ाई करीब दो दशक पुरानी है। साल 2004 में बिहार सरकार ने विज्ञापन संख्या 704/2004 के तहत 1510 सब-इंस्पेक्टर पदों के लिए भर्ती निकाली थी। इस भर्ती की प्रक्रिया काफी लंबी और विवादों से भरी रही:

  • 2006: शारीरिक दक्षता परीक्षा आयोजित की गई।

  • 2008: लिखित परीक्षा का आयोजन हुआ और उसी साल अंतिम परिणाम घोषित किया गया।

  • विवाद की शुरुआत: परीक्षा के प्रश्न पत्रों में त्रुटियों और पुनर्मूल्यांकन (Re-evaluation) को लेकर मामला कोर्ट पहुंच गया। इस दौरान 160 चयनित अभ्यर्थियों को मेरिट लिस्ट से हटा दिया गया था, हालांकि बाद में सरकार ने उन्हें सेवा में बनाए रखने का फैसला लिया।

एकलपीठ का फैसला और सरकार की चुनौती

इससे पहले, हाईकोर्ट की एकलपीठ ने अभ्यर्थियों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि जो अभ्यर्थी मेडिकल जांच में फिट पाए गए हैं, उन्हें 6 सप्ताह के भीतर दारोगा पद पर नियुक्त किया जाए।

राज्य सरकार ने इस फैसले को मानने के बजाय इसे डबल बेंच में चुनौती दी और एलपीए (Letters Patent Appeal) दाखिल किया। सरकार का तर्क था कि नियुक्ति प्रक्रिया काफी समय पहले ही पूरी हो चुकी है और अब नए सिरे से बहाली करना संभव नहीं है।

खंडपीठ के फैसले के मुख्य बिंदु

जस्टिस संगम कुमार साहू और जस्टिस हरीश कुमार की खंडपीठ ने सरकार के तर्कों को सही माना और एकलपीठ के फैसले को पलटते हुए निम्नलिखित बातें कहीं:

1. नियुक्ति प्रक्रिया का समय समाप्त

कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि यह भर्ती प्रक्रिया वर्ष 2023 और 2024 तक पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। इतने लंबे समय के बाद अब भर्ती प्रक्रिया में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करना उचित नहीं है।

2. सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला

283 अभ्यर्थियों ने समानता के अधिकार (Right to Equality) का हवाला देते हुए मांग की थी कि उन्हें भी उन्हीं 133 अभ्यर्थियों की तरह नियुक्ति दी जाए, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बहाल किया गया था। हालांकि, खंडपीठ ने कहा कि उन 133 अभ्यर्थियों की स्थिति और इन 283 अभ्यर्थियों की स्थिति अलग है, इसलिए उनकी तुलना नहीं की जा सकती।

3. पुलिस विभाग का तर्क स्वीकार

पुलिस विभाग ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि सुप्रीम कोर्ट का पिछला आदेश केवल एक विशेष श्रेणी के अभ्यर्थियों के लिए था, जो एक तय कानूनी प्रक्रिया के तहत आए थे। हाईकोर्ट की डबल बेंच ने पुलिस विभाग के इस तर्क को स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ताओं की मांग को खारिज कर दिया।

अभ्यर्थियों की उम्मीदों पर फिरा पानी

इस फैसले के बाद उन 283 अभ्यर्थियों में भारी निराशा है जो पिछले कई वर्षों से कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे। मेडिकल फिट होने के बावजूद अब उनके पास नियुक्ति का रास्ता लगभग बंद हो गया है।

अदालत ने साफ कर दिया कि कानूनी बारीकियों और समय सीमा को देखते हुए अब पुरानी रिक्तियों को भरना संभव नहीं है। इस 42 पेज के विस्तृत आदेश ने यह स्पष्ट कर दिया है कि 2004 की इस ऐतिहासिक भर्ती का कानूनी अध्याय अब समाप्ति की ओर है।

पटना हाईकोर्ट का यह फैसला राज्य सरकार के लिए बड़ी राहत लेकर आया है, क्योंकि सरकार पर पुरानी भर्तियों को लेकर लगातार दबाव बना हुआ था। दूसरी ओर, अभ्यर्थियों के लिए यह एक कड़वा अनुभव है। अब यह देखना होगा कि क्या ये अभ्यर्थी इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हैं या 22 साल पुराने इस विवाद पर यहीं पूर्णविराम लग जाता है।

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