धर्म परिवर्तन करने पर खत्म होगा SC दर्जा — सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, हिंदू-सिख-बौद्ध को छोड़ अन्य धर्म अपनाने पर नहीं मिलेगा आरक्षण

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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (SC-ST) आरक्षण को लेकर एक ऐतिहासिक और बेहद अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि जो व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को अपनाता है, उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता और वह SC दर्जे से मिलने वाले किसी भी संवैधानिक लाभ का हकदार नहीं रहेगा।


किस पीठ ने सुनाया फैसला?

यह महत्वपूर्ण फैसला जस्टिस पी. के. मिश्रा और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की पीठ ने सुनाया। पीठ ने कहा कि किसी अन्य धर्म में धर्मांतरण करने पर अनुसूचित जाति का दर्जा तुरंत और पूरी तरह से समाप्त हो जाता है। इस फैसले में कोई अपवाद नहीं है और यह रोक पूरी तरह लागू होती है।


अदालत ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 का हवाला देते हुए कहा कि इस आदेश में पहले से ही यह बात स्पष्ट रूप से दर्ज है। आदेश के क्लॉज 3 में उल्लिखित धर्मों यानी हिंदू, सिख और बौद्ध के अलावा किसी अन्य धर्म को अपनाने पर जन्म की स्थिति चाहे जो भी हो, अनुसूचित जाति का दर्जा तुरंत खत्म हो जाता है।

अदालत ने यह भी कहा कि ऐसा कोई भी व्यक्ति जिसे क्लॉज 3 के तहत अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाता, वह संविधान, संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा बनाए गए किसी भी कानून के तहत कोई भी वैधानिक लाभ, सुरक्षा, आरक्षण या अधिकार न तो प्राप्त कर सकता है और न ही उसका दावा कर सकता है।

कोर्ट ने यह भी साफ किया कि कोई भी व्यक्ति एक साथ किसी अन्य धर्म का पालन करते हुए अनुसूचित जाति की सदस्यता का दावा नहीं कर सकता। दोनों एक साथ संभव नहीं हैं।


क्या है पूरा मामला?

सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के पहले के उस फैसले को सही ठहराया जिसमें कहा गया था कि जो लोग ईसाई धर्म अपना लेते हैं और सक्रिय रूप से उसका पालन करते हैं, वे अपना अनुसूचित जाति का दर्जा बरकरार नहीं रख सकते। इसी मामले में उच्च न्यायालय के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी, जिस पर अब शीर्ष अदालत ने अपना अंतिम फैसला सुना दिया है।


फैसले का महत्व

यह फैसला उन सभी मामलों पर सीधा असर डालेगा जहां धर्म परिवर्तन के बाद भी SC आरक्षण का लाभ उठाने का प्रयास किया जाता रहा है। सुप्रीम कोर्ट के इस स्पष्ट निर्णय के बाद अब ऐसे किसी भी दावे की कानूनी गुंजाइश नहीं बचती। यह फैसला भारत में आरक्षण नीति और धर्म परिवर्तन के आपसी संबंध को लेकर लंबे समय से चली आ रही बहस पर एक निर्णायक विराम लगाता है।

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