BNT Desk: बिहार के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में शिक्षकों की भारी कमी अब एक गंभीर आपातकाल में बदल चुकी है। ताज़ा आंकड़ों ने राज्य सरकार की स्वास्थ्य नीतियों पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के प्रमुख मेडिकल कॉलेजों में लगभग 50 प्रतिशत शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं। सबसे चिंताजनक स्थिति असिस्टेंट प्रोफेसरों की है, जहाँ 85 प्रतिशत से अधिक पद रिक्त हैं।
मरीजों और छात्रों पर दोहरा प्रहार
शिक्षकों की इस कमी का सीधा असर दो मोर्चों पर पड़ रहा है:
- शिक्षा का गिरता स्तर: मेडिकल छात्र बिना पर्याप्त मार्गदर्शन और विशेषज्ञों के पढ़ाई करने को मजबूर हैं। प्रैक्टिकल और रिसर्च वर्क पूरी तरह ठप पड़ा है।
- इलाज के लिए भटकते मरीज: अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की अनुपलब्धता के कारण मरीजों को या तो निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ रहा है या फिर इलाज के अभाव में दूसरे राज्यों में जाना पड़ रहा है।
कानूनी पेंच और प्रशासनिक सुस्ती
हैरानी की बात यह है कि यह कमी संसाधनों के अभाव में नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलताओं के कारण है। शिक्षकों की बहाली की प्रक्रिया पिछले कई वर्षों से कानूनी विवादों और तकनीकी अड़चनों में फंसी हुई है। मामला कोर्ट में होने के कारण भर्ती प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही है, जिससे योग्य उम्मीदवार होने के बावजूद हजारों पद खाली पड़े हैं।
सुपर स्पेशियलिटी विभागों की बदहाली
मेडिकल कॉलेजों के आपातकालीन और सुपर स्पेशियलिटी विभागों की स्थिति और भी बदतर है। यहाँ डॉक्टरों की कमी का मतलब है—मरीजों की जान पर जोखिम। हृदय रोग, न्यूरोलॉजी और नेफ्रोलॉजी जैसे महत्वपूर्ण विभागों में विशेषज्ञों के न होने से सामान्य गरीब जनता को समय पर इलाज नहीं मिल पा रहा है।
आगे की राह और विशेषज्ञों की चेतावनी
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार ने तत्काल प्रभाव से कोई वैकल्पिक रास्ता नहीं निकाला या कानूनी अड़चनों को दूर नहीं किया, तो राज्य की पूरी स्वास्थ्य प्रणाली ध्वस्त हो सकती है। अब राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग की सक्रियता पर ही बिहार के लाखों मरीजों और हजारों मेडिकल छात्रों का भविष्य टिका है।