BNT Desk: बिहार में ‘गांव की सरकार’ चुनने की प्रशासनिक और राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं. राज्य में एक बार फिर त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव कराने की तैयारियां युद्ध स्तर पर शुरू हो चुकी हैं. इस बार का पंचायत चुनाव कई मायनों में बेहद दिलचस्प और ऐतिहासिक होने वाला है. राजनीतिक गलियारों और प्रशासनिक सूत्रों से मिल रही जानकारी के अनुसार, बिहार में पंचायत चुनाव अक्टूबर से नवंबर 2026 के बीच कराए जा सकते हैं.
इस बार के चुनाव का सबसे बड़ा यू-टर्न आरक्षण व्यवस्था में होने वाला बड़ा बदलाव है. राज्य की करीब आधी पंचायतों में आरक्षण का पूरा का पूरा समीकरण बदलने जा रहा है, जिससे कई दिग्गजों के सियासी समीकरण बिगड़ सकते हैं, तो कई नए चेहरों की किस्मत चमक सकती है.
अगस्त-सितंबर में जारी होगा नोटिफिकेशन
बिहार में इससे पिछला पंचायत चुनाव साल 2021 में आयोजित किया गया था. उस चुनाव के बाद गठित हुई पंचायतों का 5 साल का कार्यकाल दिसंबर 2026 में समाप्त होने जा रहा है. नियमों के अनुसार कार्यकाल खत्म होने से पहले ही चुनाव प्रक्रिया पूरी कर लेनी होती है.
चुनाव का संभावित टाइमलाइन:
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आधिकारिक अधिसूचना (Notification): अगस्त या सितंबर 2026 में जारी होने की पूरी संभावना है.
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मतदान की अवधि: अक्टूबर से नवंबर 2026 के बीच.
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चरणों की संख्या: राज्य निर्वाचन आयोग इस बार पूरे बिहार में लगभग 9 चरणों में मतदान कराने की योजना बना रहा है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक इंतजाम दुरुस्त रहें.
4000 से ज्यादा पंचायतों में बदलेगा आरक्षण का ‘चक्र’
बिहार पंचायत चुनाव 2026 की सबसे बड़ी और खास चर्चा आरक्षण व्यवस्था (Reservation Roster) को लेकर है. पंचायती राज नियमों के मुताबिक, महिलाओं, अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) के लिए सीटों का आरक्षण एक निश्चित चक्र (Rotation) के अनुसार बदलता रहता है.
इस बार बिहार की कुल 8,053 पंचायतों में से लगभग 4,000 से अधिक पंचायतों में सीटों का आरक्षण बदल जाएगा.
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रणनीति बदलने की मजबूरी: जो सीटें पिछले चुनाव में ‘सामान्य’ (General) थीं, वे इस बार आरक्षित हो सकती हैं. इसी तरह पुरानी आरक्षित सीटें इस बार सामान्य हो सकती हैं.
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दिग्गजों को झटका: इस बदलाव का सीधा असर उन स्थानीय नेताओं पर पड़ेगा जो पिछले पांच सालों से किसी खास सीट पर दोबारा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे. सीट आरक्षित होने पर वे खुद मैदान से बाहर हो सकते हैं.
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नए चेहरों को मौका: इस बदलाव से उन जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं और नए चेहरों के लिए रास्ते खुल जाएंगे, जो योग्यता के बावजूद केवल जातिगत या श्रेणीगत आरक्षण के कारण पिछले चुनाव नहीं लड़ पाए थे.
बिहार पंचायत चुनाव के मुख्य आंकड़े
बिहार का ग्रामीण चुनाव देश के सबसे बड़े स्थानीय चुनावों में से एक माना जाता है. इस बार के चुनावी ढांचे को समझने के लिए कुछ आंकड़ों पर नजर डालना जरूरी है:
| विवरण | कुल संख्या |
| कुल ग्राम पंचायतों की संख्या | 8,053 |
| कुल वार्डों की संख्या | लगभग 1.15 लाख |
| कुल पंचायत समितियां | 533 |
| इस्तेमाल होने वाली संभावित EVM | लगभग 32,000 |
प्रशासनिक स्तर पर मतदाता सूची को अपडेट करने, नए मतदान केंद्रों (Polling Booths) को चिह्नित करने और सुरक्षा बलों की तैनाती का खाका तैयार करने का काम शुरू कर दिया गया है.
किन-किन पदों के लिए जनता चुनेगी अपना प्रतिनिधि?
बिहार पंचायत चुनाव में मुख्य रूप से छह अलग-अलग स्तरों के पदों के लिए वोट डाले जाते हैं. आइए सीधे और सरल शब्दों में समझते हैं कि ये पद कौन से हैं और इनका काम क्या है:
1. मुखिया (Gram Panchayat Head)
यह ग्राम पंचायत का प्रधान और कार्यकारी प्रमुख होता है. गांव के विकास कार्यों, सरकारी योजनाओं को धरातल पर उतारने और फंड के सही इस्तेमाल की पूरी जिम्मेदारी मुखिया की ही होती है.
2. वार्ड सदस्य (Ward Member)
पंचायत के भीतर आने वाले एक विशिष्ट वार्ड या मोहल्ले का प्रतिनिधित्व करते हैं. नाली, गली और बिजली जैसी बुनियादी समस्याओं का निपटारा वार्ड स्तर पर इन्हीं के माध्यम से होता है.
3. सरपंच (Sarpanch)
यह ग्राम कचहरी का मुख्य प्रशासनिक अधिकारी होता है. गांव के आपसी विवादों, छोटे-मोटे झगड़ों और जमीन-जायदाद से जुड़े दीवानी मामलों को आपसी सहमति से सुलझाना इनका मुख्य काम है.
4. पंच (Panch)
ग्राम कचहरी में वार्ड स्तर के प्रतिनिधि होते हैं, जो सरपंच के साथ मिलकर पंचायती न्याय व्यवस्था में सहयोग करते हैं.
5. पंचायत समिति सदस्य (BDC Member)
प्रत्येक प्रखंड (Block) में कई पंचायतों को मिलाकर एक क्षेत्र बनाया जाता है, जहां से एक सदस्य चुना जाता है. यह ब्लॉक स्तर पर विकास की योजनाओं की पैरवी करते हैं.
6. प्रखंड प्रमुख (Block Pramukh)
जनता द्वारा सीधे चुने गए सभी पंचायत समिति सदस्य मिलकर अपने बीच से एक वोटिंग प्रक्रिया के जरिए ‘प्रखंड प्रमुख’ का चुनाव करते हैं. यह ब्लॉक स्तर का सबसे बड़ा पद होता है.
विकास और स्थानीय मुद्दे रहेंगे सबसे ऊपर
जैसे-जैसे मानसून खत्म होगा और त्योहारों का सीजन नजदीक आएगा, बिहार के गांवों के चौपालों पर चुनावी बैठकों का दौर तेज हो जाएगा. पंचायत चुनाव सीधे तौर पर जनता से जुड़ा होता है, इसलिए इसमें राष्ट्रीय मुद्दों के बजाय स्थानीय मुद्दे सबसे ज्यादा हावी रहते हैं.
इस बार भी गांवों में सड़क की स्थिति, पक्की नाली-गली, हर घर नल का जल, प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ, राशन कार्ड की उपलब्धता और स्थानीय स्तर पर होने वाले भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर जनता अपने वर्तमान प्रतिनिधियों से सीधा हिसाब मांगेगी. फिलहाल, पूरे बिहार की नजरें राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा जारी होने वाले नए आरक्षण रोस्टर पर टिकी हैं. इसके बाद ही साफ हो पाएगा कि किस गांव का राजनीतिक भविष्य किस करवट बैठने वाला है.