BNT Desk: बिहार में बुधवार को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक उस समय चर्चा में आ गई, जब रिटायर्ड अधिकारियों को संविदा पर दोबारा नियुक्त करने के मुद्दे पर दो वरिष्ठ मंत्रियों के बीच तीखी बहस होने की बात सामने आई। बताया जा रहा है कि मामला इतना बढ़ गया कि बैठक का माहौल तनावपूर्ण हो गया और मुख्यमंत्री को खुद हस्तक्षेप कर स्थिति संभालनी पड़ी। विवाद की मुख्य वजह सेवानिवृत्त अधिकारियों को रिटायरमेंट के बाद दोबारा संविदा पर जिम्मेदारी देने की व्यवस्था बताई जा रही है। बैठक में भाजपा कोटे के एक वरिष्ठ मंत्री ने कथित तौर पर इस नीति पर सवाल उठाया। उनका तर्क था कि अगर सरकार के पास काम करने वाले और योग्य अधिकारी मौजूद हैं, तो रिटायर हो चुके अधिकारियों को दोबारा उसी तरह की जिम्मेदारी देने की जरूरत क्यों पड़ रही है।
संविदा नियुक्ति की नीति पर उठे सवाल
बैठक में भाजपा के वरिष्ठ मंत्री ने कथित तौर पर कहा कि रिटायरमेंट के बाद अधिकारियों को बार-बार संविदा पर रखने की परंपरा पहले से चली आ रही है। उनके मुताबिक, इस व्यवस्था से प्रशासनिक पारदर्शिता और सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ सकते हैं। मंत्री ने कथित तौर पर यह भी सवाल किया कि क्या सरकार में योग्य अधिकारियों की कमी है, जो सेवानिवृत्त अधिकारियों की सेवाएं दोबारा लेने की जरूरत पड़ रही है। इसी मुद्दे पर जदयू कोटे के एक वरिष्ठ मंत्री से उनकी तीखी बहस होने की बात कही जा रही है। जदयू मंत्री ने कथित तौर पर सवाल उठाया कि अगर पूरी कैबिनेट को इस व्यवस्था पर आपत्ति नहीं है, तो एक मंत्री ही इस पर इतना सवाल क्यों उठा रहे हैं।
बहस बढ़ी तो सामने आए तीखे बयान
सूत्रों के हवाले से यह भी दावा किया जा रहा है कि बहस के दौरान दोनों नेताओं के बीच काफी तीखे शब्दों का इस्तेमाल हुआ। यहां तक कि मंत्री पद छोड़ने जैसी टिप्पणी किए जाने की बात भी सामने आई है। इसके जवाब में भाजपा के वरिष्ठ मंत्री की ओर से भी कथित तौर पर तल्ख टिप्पणी की गई। उन्होंने कहा कि मंत्री बनने में भाजपा की भूमिका है। इसके बाद बैठक का माहौल और गर्म हो गया। एक मंत्री की ओर से कथित तौर पर यह भी कहा गया कि संविदा पर अधिकारियों को रखने की व्यवस्था पहले के शासनकाल से चली आ रही है और इससे सरकार की छवि पर असर पड़ता है। मामला बढ़ता देख मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने हस्तक्षेप किया और दोनों पक्षों को शांत कराया।
पूनम सिन्हा की संविदा बहाली बनी विवाद का केंद्र
इसी बीच कैबिनेट के सामने बिहार विधानसभा सचिवालय की निदेशक-सह-प्रभारी सचिव पूनम कुमारी सिन्हा से जुड़ा प्रस्ताव भी था। पूनम सिन्हा 31 अगस्त 2026 को अपने पद से सेवानिवृत्त हुई थीं। इसके ठीक अगले दिन यानी 1 सितंबर 2026 से उन्हें एक साल के लिए संविदा के आधार पर दोबारा नियुक्त करने का प्रस्ताव कैबिनेट के सामने रखा गया। प्रस्ताव में यह व्यवस्था की गई कि नियमित प्रोन्नति या वेतनमान सहित किसी उच्चतर पद पर कार्यकारी प्रभार मिलने तक, जो भी पहले हो, तब तक यह नियुक्ति प्रभावी रहेगी। कैबिनेट ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी।
एक ही बैठक में सवाल भी और मंजूरी भी
यही फैसला अब राजनीतिक चर्चा का बड़ा कारण बन गया है। एक तरफ कैबिनेट बैठक में संविदा नियुक्तियों की नीति पर सवाल उठाए जाने की बात सामने आई, वहीं दूसरी तरफ उसी बैठक में रिटायरमेंट के तुरंत बाद एक अधिकारी को दोबारा संविदा पर जिम्मेदारी देने को मंजूरी मिल गई। इस फैसले के बाद सवाल उठ रहा है कि आखिर ऐसी कौन-सी प्रशासनिक जरूरत थी, जिसके चलते रिटायरमेंट के तुरंत बाद उसी अधिकारी की सेवाएं फिर से ली गईं। सरकार की ओर से यह तर्क दिया जा सकता है कि अनुभवी अधिकारियों की विशेषज्ञता का इस्तेमाल प्रशासन के हित में किया जा सकता है। लेकिन आलोचकों का सवाल है कि ऐसी नियुक्तियों के लिए स्पष्ट और पारदर्शी नियम होने चाहिए।
मेरिट और पारदर्शिता पर भी बहस
संविदा पर रिटायर अधिकारियों की नियुक्ति का मुद्दा सिर्फ एक अधिकारी तक सीमित नहीं है। इसके साथ मेरिट, पारदर्शिता और प्रशासनिक अवसरों से जुड़े सवाल भी जुड़े हैं। अगर बार-बार चुनिंदा सेवानिवृत्त अधिकारियों को ही संविदा पर जिम्मेदारी मिलती है, तो दूसरे योग्य अधिकारियों के लिए अवसरों को लेकर सवाल उठ सकते हैं। साथ ही, लंबे समय तक एक ही व्यक्ति के किसी पद पर बने रहने से विभाग में पदोन्नति और नई जिम्मेदारियों के अवसर भी प्रभावित होने की आशंका जताई जाती है। इसी वजह से बिहार में रिटायर अधिकारियों की संविदा बहाली को लेकर पहले से चल रही बहस एक बार फिर तेज हो गई है।
‘एक्सटेंशन कल्चर’ पर फिर सवाल
बिहार की नौकरशाही में रिटायरमेंट के बाद अधिकारियों को संविदा पर जिम्मेदारी देने की व्यवस्था नई नहीं है। लेकिन जब किसी अधिकारी को रिटायरमेंट के तुरंत बाद उसी व्यवस्था में वापस लाया जाता है, तो इसे लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक सवाल उठना स्वाभाविक है। अब चर्चा इस बात पर है कि क्या संविदा नियुक्तियां वास्तव में प्रशासनिक जरूरत पूरी करने का माध्यम हैं या फिर अनुभवी और प्रभावशाली अधिकारियों को लंबे समय तक जिम्मेदारी में बनाए रखने का तरीका बन रही हैं। पूनम सिन्हा की नियुक्ति को मंजूरी मिलने के बाद यह मुद्दा और ज्यादा चर्चा में आ गया है। आने वाले दिनों में सरकार से इस तरह की नियुक्तियों के नियम, जरूरत और प्रक्रिया को लेकर स्पष्टीकरण की मांग उठ सकती है। फिलहाल कैबिनेट बैठक में मंत्रियों के बीच हुई कथित बहस और रिटायरमेंट के तुरंत बाद संविदा नियुक्ति को मिली मंजूरी ने बिहार की राजनीति में ‘एक्सटेंशन कल्चर’ और प्रशासनिक पारदर्शिता की बहस को फिर से सामने ला दिया है।