नवादा में हाथियों का तांडव: 40 दिनों से दहशत में ग्रामीण, 3 की मौत

BiharNewsAuthor
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BNT Desk: बिहार के नवादा जिले का गोविंदपुर प्रखंड इन दिनों किसी युद्ध क्षेत्र जैसा नजर आ रहा है। यहाँ के माधोपुर और आसपास के गांवों में पिछले 40 दिनों से हाथियों का आतंक इस कदर फैला है कि लोग अपने ही घरों में कैद होने को मजबूर हैं। हाथियों के हमले में अब तक तीन लोगों की जान जा चुकी है, लेकिन प्रशासन और वन विभाग की सुस्ती ने ग्रामीणों के सब्र का बांध तोड़ दिया है।

40 दिन और 3 मासूम जानें

गोविंदपुर इलाके में हाथियों का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा है। पिछले 40 दिनों के भीतर हाथियों ने तीन अलग-अलग घटनाओं में ग्रामीणों को कुचलकर मार डाला है। मौत के इस तांडव ने सरकारी दावों की पोल खोल दी है। आलम यह है कि सूरज ढलते ही लोग डर के मारे पेड़ों पर चढ़ जाते हैं या छतों पर रात बिताते हैं। हाथियों का यह जोड़ा न केवल इंसानों पर हमला कर रहा है, बल्कि घरों को ध्वस्त कर रहा है और खेतों में लगी लहलहाती फसलों को रौंदकर किसानों की कमर तोड़ रहा है।

वन विभाग के खिलाफ सड़क पर उतरे ग्रामीण

शुक्रवार को ग्रामीणों का गुस्सा फूट पड़ा। सैकड़ों की संख्या में स्थानीय लोगों ने सड़क जाम कर वन विभाग और जिला प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि 40 दिन बीत जाने के बाद भी वन विभाग इन हाथियों को खदेड़ने या पकड़ने में पूरी तरह विफल रहा है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि विभाग के अधिकारी केवल आश्वासन देते हैं, जबकि जमीन पर हाथी लगातार तबाही मचा रहे हैं। “हमें मुआवजा नहीं, सुरक्षा चाहिए,” के नारों से पूरा इलाका गूंज उठा।

कैसे शुरू हुआ हाथियों का यह उत्पात?

हाथियों की दहशत की कहानी करीब 40 दिन पहले शुरू हुई थी।

  • 27-28 मार्च: हाथियों का एक बड़ा झुंड (लगभग 26 हाथी) जमुई जिले से होते हुए कौआकोल के रास्ते गोविंदपुर के महावरा इलाके में दाखिल हुआ था।

  • रेस्क्यू ऑपरेशन: वन विभाग ने काफी मशक्कत के बाद इस झुंड को रजौली के रास्ते कोडरमा (झारखंड) की ओर खदेड़ दिया था।

  • पीछे छूटे दो हाथी: झुंड के जाने के बाद दो हाथी इसी इलाके में भटककर रह गए। यही दो हाथी अब माधोपुर और हरनारायणपुर इलाकों में मौत का पर्याय बने हुए हैं।

फसलों और घरों को भारी नुकसान

हाथी केवल जान ही नहीं ले रहे, बल्कि ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति पर भी चोट कर रहे हैं। रात के अंधेरे में हाथी गांवों में घुस आते हैं और घरों के किवाड़ तोड़कर अंदर रखा अनाज चट कर जाते हैं। किसानों का कहना है कि उनकी मेहनत की कमाई (फसलें) हाथियों के पैरों तले कुचली जा चुकी है। अब तक लाखों रुपये की संपत्ति का नुकसान हो चुका है, लेकिन वन विभाग की ओर से अभी तक ठोस आकलन या सहायता की प्रक्रिया शुरू नहीं की गई है।

सरकारी व्यवस्था पर उठते सवाल

इतने लंबे समय तक एक छोटे से इलाके में दो हाथियों का आतंक जारी रहना वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़ा करता है:

  1. क्या वन विभाग के पास हाथियों को ट्रेंकुलाइज (बेहोश) करने या सुरक्षित स्थान पर ले जाने के संसाधन नहीं हैं?

  2. तीन मौतों के बाद भी विभाग किसी ‘बड़ी घटना’ का इंतजार क्यों कर रहा है?

  3. इलाके में हाथियों की निगरानी के लिए ड्रोन या अन्य आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा रहा?

समाधान की दरकार

गोविंदपुर के माधोपुर गांव के लोग आज खौफ के साये में जीने को मजबूर हैं। हाथियों और इंसानों के बीच चल रहा यह संघर्ष अब हिंसक रूप ले चुका है। ग्रामीणों की मांग है कि अविलंब विशेषज्ञ टीम बुलाई जाए और इन हाथियों को घने जंगलों में वापस भेजा जाए। यदि जल्द ही कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो स्थिति और भी भयावह हो सकती है। फिलहाल, पूरा इलाका प्रशासन की ओर उम्मीद भरी निगाहों से देख रहा है।

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