BNT Desk: सरकार और प्रशासन की फाइलों में सब कुछ ‘नियंत्रण’ में बताया जा रहा है, लेकिन बिहार की सड़कों और गैस एजेंसियों के बाहर लगी लंबी कतारें एक अलग ही कहानी बयां कर रही हैं। राज्य में एलपीजी (LPG) सिलेंडर का संकट अब गहराता जा रहा है। आंकड़े बताते हैं कि बिहार में करीब 16.56 लाख लोग अपनी बारी के इंतजार में हैं, जबकि सरकार अब भी कह रही है कि घबराने की जरूरत नहीं है।
पेंडिंग बुकिंग का पहाड़: 16 लाख के पार पहुंचा आंकड़ा
ताजा आंकड़ों के अनुसार, बिहार में गैस की किल्लत कम होने के बजाय हर दिन बढ़ती जा रही है। 29 मार्च को जहां पेंडिंग बुकिंग 15.22 लाख थी, वहीं 6 अप्रैल तक यह बढ़कर 16,56,776 हो गई है। महज एक हफ्ते में दो लाख से ज्यादा नए परिवार इस वेटिंग लिस्ट में जुड़ गए हैं।
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाइए कि:
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शहरों में वेटिंग पीरियड: 48 दिन।
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ग्रामीण इलाकों में वेटिंग पीरियड: 55 दिन।
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राजधानी पटना: यहाँ अकेले 1.62 लाख से ज्यादा लोग सिलेंडर का इंतजार कर रहे हैं।
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सर्वाधिक प्रभावित जिले: पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण और दरभंगा में हालात सबसे ज्यादा खराब हैं।
आखिर क्यों पैदा हुआ यह संकट?
इस संकट के पीछे अंतरराष्ट्रीय और स्थानीय दोनों कारण जिम्मेदार हैं।
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वैश्विक तनाव: अमेरिका और ईरान के बीच पिछले 40 दिनों से जारी खींचतान ने वैश्विक एनर्जी सप्लाई चेन को तोड़ दिया है। भारत में एलपीजी के आयात पर दबाव बढ़ा, जिसका सीधा असर बिहार जैसे राज्यों की सप्लाई पर पड़ा।
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PNG की सुस्त रफ्तार: यदि पाइप वाली गैस (PNG) का नेटवर्क मजबूत होता, तो सिलेंडर पर निर्भरता कम होती। सरकार ने मार्च 2026 तक 3.75 लाख कनेक्शन का लक्ष्य रखा था, लेकिन अब तक केवल 26% (99 हजार) काम ही पूरा हो पाया है।
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अफसरों की लापरवाही: बिहार के 14 जिले ऐसे हैं जहां एक भी पीएनजी उपभोक्ता नहीं है। इनमें मुख्यमंत्री का गृह जिला नालंदा भी शामिल है, जिसे लेकर हाल ही में अधिकारियों को भारी फटकार भी पड़ी है।
सरकार की ‘जागने’ के बाद की तैयारी
जब चौतरफा दबाव बढ़ा, तब सरकार ने क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप (CMG) को सक्रिय किया है। स्थिति को संभालने के लिए अब भारी-भरकम प्रशासनिक अमला मैदान में है:
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IAS अफसरों की तैनाती: 38 वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों को जिला प्रभारी सचिव बनाकर जमीन पर हालात समझने भेजा गया है।
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पुलिस और सुरक्षा: बिहार के 15 बॉटलिंग प्लांट और बरौनी रिफाइनरी पर CISF व पुलिस का पहरा है। 199 संवेदनशील गैस एजेंसियों पर पुलिस तैनात की गई है ताकि अफरा-तफरी न मचे।
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कंट्रोल रूम: शिकायतों के लिए हेल्पलाइन नंबर 0612-2233050 जारी किया गया है। अब तक 4500 से ज्यादा शिकायतें मिली हैं, जिनमें से 3600 के निपटारे का दावा किया गया है।
क्या सिर्फ निगरानी से बुझ जाएगी भूख?
प्रशासनिक सख्ती और छापेमारी से जमाखोरी तो रुक सकती है, लेकिन जब तक सप्लाई और डिमांड के बीच का विशाल अंतर कम नहीं होगा, आम जनता को राहत नहीं मिलेगी। जिस घर में दो दिन से चूल्हा नहीं जला है, उसे वरिष्ठ अधिकारियों की बैठकों से नहीं, बल्कि समय पर आने वाले सिलेंडर से मतलब है।
बिहार का यह संकट एक सबक है कि हमें भविष्य की ऊर्जा जरूरतों के लिए अपने इंफ्रास्ट्रक्चर (जैसे PNG) को समय पर तैयार रखना होगा। फिलहाल, बिहार की जनता सिर्फ उम्मीद कर सकती है कि अंतरराष्ट्रीय हालात सुधरें और सरकार की फाइलें हकीकत में बदलें।
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