BNT Desk: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा में शांति बहाली के नाम पर ‘बोर्ड ऑफ पीस’ का गठन किया है, जिसने वैश्विक राजनीति में खलबली मचा दी है। ट्रंप की इस नई संस्था को संयुक्त राष्ट्र (UN) के विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है, जिससे दुनिया की कई बड़ी महाशक्तियां नाराज हैं। शुरुआती दौर में ही इस पहल को कड़ा विरोध झेलना पड़ रहा है और अब तक ब्रिटेन, फ्रांस और चीन जैसे देशों ने इसमें शामिल होने से साफ इनकार कर दिया है।
आखिर विवाद क्यों है?
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह बोर्ड केवल गाजा में युद्ध रोकने तक सीमित होता, तो शायद पूरी दुनिया इसका समर्थन करती। लेकिन ट्रंप ने इसके चार्टर में कुछ ऐसी शर्तें जोड़ी हैं जिसने सबको हैरान कर दिया है। इस बोर्ड के मुखिया खुद ट्रंप रहेंगे और उनके पास फैसलों पर ‘वीटो’ की ताकत होगी। कई देश इसे ‘ट्रंप फैन क्लब’ कह रहे हैं, क्योंकि इसमें शामिल होने के लिए भारी रकम (पे-टू-प्ले) की मांग और ट्रंप के आजीवन नेतृत्व जैसे नियम रखे गए हैं।
महाशक्तियों का कड़ा रुख
दुनिया के ताकतवर देशों ने ट्रंप के इस प्रस्ताव को ठुकरा कर संयुक्त राष्ट्र पर अपना भरोसा जताया है। ब्रिटेन और फ्रांस ने स्पष्ट किया है कि वे 80 साल पुराने अंतरराष्ट्रीय नियमों के साथ कोई समझौता नहीं करेंगे। वहीं, चीन ने इसे ‘ताकत के बल पर शर्तें थोपना’ करार दिया है। कनाडा और डेनमार्क जैसे करीबी सहयोगी भी तब नाराज हो गए जब ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर कब्जे जैसी विवादास्पद बात कही, हालांकि बाद में उन्होंने इस पर यू-टर्न ले लिया।
कौन साथ है और भारत की क्या है स्थिति?
अब तक आमंत्रित 60 देशों में से केवल 26 ही इस बोर्ड का हिस्सा बने हैं। इनमें तुर्की, सऊदी अरब, पाकिस्तान और यूएई जैसे देश शामिल हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य गाजा में शांति स्थापित करना है। दूसरी ओर, भारत ने अभी तक इस पर कोई फैसला नहीं लिया है। दावोस में हुए हस्ताक्षर समारोह में भारत शामिल नहीं हुआ और वह फिलहाल ‘वेट एंड वॉच’ की नीति अपना रहा है।
क्या फेल हो जाएगी ट्रंप की योजना?
फिलहाल ट्रंप की यह नई व्यवस्था बैकफायर करती दिख रही है। कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रभाव को खत्म करना इतना आसान नहीं है। मानवता और अधिकारों की बात करने वाले संगठनों ने भी इसकी आलोचना की है। अब देखना यह होगा कि क्या ट्रंप अपने इस ‘बोर्ड ऑफ पीस’ को दुनिया के सामने जायज साबित कर पाते हैं या यह महज एक अमेरिकी राजनीतिक स्टंट बनकर रह जाएगा।