बिहार की राजनीति में इस वक्त दो बड़ी चर्चाएं हैं… पहली, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) का मुख्यमंत्री पद छोड़कर दिल्ली (राज्यसभा) प्रस्थान और दूसरी, बिहार सरकार के खजाने की डांवाडोल स्थिति। यदि आप बिहार सरकार के कर्मचारी हैं, चाहे शिक्षक हों, क्लर्क हों, दरोगा हों या सचिवालय कर्मी, तो आपके मन में इस वक्त सबसे बड़ा सवाल यही है कि मार्च महीने की तनख्वाह (Salary) अब तक खाते में क्यों नहीं आई?
क्या ‘सुशासन बाबू’ के जाते-जाते बिहार का खजाना खाली हो गया है? आखिर क्यों 10 लाख कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को अपनी मेहनत की कमाई के लिए इंतजार करना पड़ रहा है? आइए, बिहार के इस गहरे आर्थिक संकट और राजनीतिक बदलाव की कड़ियों को जोड़कर समझते हैं।
10 लाख कर्मचारियों की तनख्वाह आखिर क्यों रुकी?
दैनिक भास्कर की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, बिहार के करीब 10 लाख सरकारी कर्मचारी और पेंशनभोगी मार्च की सैलरी के लिए परेशान हैं। आमतौर पर महीने के आखिरी वर्किंग डे पर आने वाली सैलरी इस बार गायब है। वित्त विभाग के सूत्रों की मानें तो:
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सचिवालय कर्मियों (50,000) को अब 6 अप्रैल से भुगतान शुरू होने की उम्मीद है।
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जिला स्तर के कर्मचारियों को 4 अप्रैल से भुगतान की बात कही गई है।
सैलरी रुकने की असली वजह: वित्त विभाग के आंकड़ों के अनुसार, बिहार सरकार ने केंद्र की विभिन्न योजनाओं में अपनी मैचिंग ग्रांट (Matching Grant) के रूप में ₹3,631 करोड़ खर्च कर दिए हैं। इसके अलावा, मार्च वित्तीय वर्ष की क्लोजिंग का महीना होता है, जिसमें बड़े भुगतान और हिसाब-किताब के कारण नकद प्रवाह (Cash Flow) धीमा हो गया। सरकार ने ट्रेजरी से भुगतान की रफ्तार को जानबूझकर नियंत्रित किया, जिसका सीधा असर कर्मचारियों की जेब पर पड़ा।
8500 करोड़ का इंतजार: मदरसा और स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड पर संकट
बिहार सरकार की नजरें अब 10 अप्रैल पर टिकी हैं। इसी दिन केंद्र सरकार से टैक्स हिस्सेदारी (Devolution) के रूप में बिहार को ₹8,500 करोड़ मिलने वाले हैं। वित्त विभाग ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि जब तक यह राशि नहीं आती, तब तक ट्रेजरी से कोई भी बड़ा भुगतान नहीं होगा।
इसका खामियाजा सिर्फ नियमित कर्मचारियों को ही नहीं, बल्कि अन्य क्षेत्रों को भी भुगतना पड़ रहा है:
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मदरसा शिक्षकों का बकाया वेतन लटका हुआ है।
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संस्कृत शिक्षा के भुगतान रुके हुए हैं।
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नीतीश सरकार की महत्वाकांक्षी स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना के तहत छात्रों के लोन डिस्बर्समेंट पर भी ब्रेक लग गया है।
बिहार की आर्थिक तस्वीर: बजट बड़ा, पर जेब खाली
फरवरी 2026 में बिहार सरकार ने ₹3.47 लाख करोड़ का अब तक का सबसे बड़ा बजट पेश किया था। लेकिन कागजी आंकड़ों और जमीनी हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर है।
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प्रतिबद्ध व्यय (Committed Expenditure): बजट का करीब 60% हिस्सा (लगभग ₹1.56 लाख करोड़) सिर्फ वेतन, पेंशन और पुराने कर्जों के ब्याज चुकाने में चला जाता है।
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विकास के लिए कम फंड: विकास कार्यों के लिए सरकार के पास बहुत कम गुंजाइश बचती है।
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केंद्र पर निर्भरता: PRS Legislative Research के अनुसार, बिहार अपनी कमाई (Own Tax Revenue) से इतना सक्षम नहीं है कि वह अपने खर्च उठा सके। राज्य आज भी अपनी राजस्व प्राप्तियों के बड़े हिस्से के लिए केंद्र की ग्रांट पर निर्भर है।
क्या चुनाव के ‘मुफ्त उपहारों’ ने खाली किया खजाना?
विशेषज्ञों का मानना है कि इस आर्थिक तंगी के पीछे 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले की गई घोषणाएं भी जिम्मेदार हैं। चुनाव जीतने के लिए नीतीश सरकार ने ‘मुफ्त की सौगातों’ की झड़ी लगा दी थी:
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फ्री बिजली: 125 यूनिट तक मुफ्त बिजली का वादा, जिससे सब्सिडी का बोझ बढ़ा।
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नकद ट्रांसफर: महिलाओं को ₹10-10 हजार की नकद सहायता।
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मानदेय में वृद्धि: आंगनबाड़ी, आशा कार्यकर्ताओं और पारा शिक्षकों के वेतन में भारी बढ़ोतरी।
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सरकारी दर्जा: पारा शिक्षकों को सरकारी कर्मचारी का दर्जा देने से वेतन मद में अरबों रुपए का अतिरिक्त भार पड़ा।
इन लोकलुभावन घोषणाओं ने वोट तो दिला दिए और सरकार भी बन गई, लेकिन इसने बिहार के आर्थिक तंत्र की कमर तोड़ दी है।
नीतीश का प्रस्थान और बिहार का भविष्य
30 मार्च को नीतीश कुमार ने विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। 10 अप्रैल को वह राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ लेंगे और चर्चा है कि 13 अप्रैल तक वह मुख्यमंत्री का पद त्याग देंगे। उनके जाने की खबर से जहां जदयू खेमे में उदासी है, वहीं विपक्षी दल तेजस्वी यादव का आरोप है कि उन्हें भाजपा के दबाव में दिल्ली भेजा जा रहा है।
नीतीश के बाद बिहार में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार आने की संभावना है, जिसमें उनके बेटे निशांत कुमार को उपमुख्यमंत्री बनाए जाने की चर्चाएं भी गर्म हैं।
नीतीश कुमार अपने पीछे एक ऐसा बिहार छोड़कर जा रहे हैं, जो आर्थिक रूप से वेंटिलेटर पर महसूस कर रहा है। सवाल यह है कि क्या नई सरकार इन वित्तीय चुनौतियों का सामना कर पाएगी? क्या कर्मचारियों को हर महीने अपनी सैलरी के लिए केंद्र की ओर ताकना पड़ेगा?
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