पटना के 1 अणे मार्ग स्थित मुख्यमंत्री आवास से लौटते हुए तस्वीर एकदम साफ है कि बिहार की राजनीति में एक बड़ा भूचाल आने वाला है। नेताओं का आना-जाना लगातार जारी है, चेहरों पर दबाव का भाव साफ झलक रहा है, और गलियारों में जो फुसफुसाहट सुनाई दे रही है, वो बता रही है कि बिहार का अगला मुख्यमंत्री वो नहीं होगा जिसका नाम अभी तक सबसे जोर से गूंज रहा था।
यह खबर उन लोगों के लिए बड़ा झटका है जो मान चुके थे कि सम्राट चौधरी बिहार के अगले सीएम होंगे। और यह संकेत उन लोगों के लिए नई उम्मीद है जो अभी तक पर्दे के पीछे थे।
1. सम्राट चौधरी: 24 घंटे में दो मुलाकातें, लेकिन हासिल कुछ नहीं
पिछले 24 घंटों में सम्राट चौधरी दो बार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मिल चुके हैं। आज करीब आधे घंटे तक बातचीत हुई। उनके साथ विजय चौधरी भी पहुंचे। लेकिन जो नेता हमेशा मीडिया को देखकर मुस्कुराते थे, हाथ जोड़कर अभिवादन करते थे। वही आज सिर झुकाए, चुपचाप बाहर निकल गए।
यह बॉडी लैंग्वेज बहुत कुछ कह रही थी। दबाव साफ दिख रहा था।
सूत्रों के मुताबिक सम्राट खुद नीतीश से पैरवी कर रहे हैं, ‘आपने कहा था आगे बढ़ाना है, तो सीएम बना दीजिए।’ लेकिन नीतीश के हाथ में अब बहुत कुछ नहीं बचा है।
अंदर की खबर यह है कि बीजेपी ने सम्राट के नाम पर अभी तक कोई गंभीर चर्चा नहीं की है। यहां तक कि दिल्ली की वह बैठक भी कैंसिल हो गई जिसमें सीएम चेहरे पर मुहर लगनी थी।
2. संघ की बैठक और सम्राट का नाम – एक बड़ी गैरमौजूदगी
कल रात संघ की एक अहम बैठक हुई। उसमें बिहार के अगले मुख्यमंत्री के नाम पर विचार-विमर्श हुआ। सूत्र बताते हैं कि सम्राट चौधरी का नाम इस बैठक में कहीं नहीं था। इसके बजाय श्रेयसी सिंह के नाम पर गंभीर चर्चा हुई। संघ से जुड़े कई अन्य नामों पर भी विचार हुआ। यह बैठक अपने आप में बहुत बड़ा संकेत है।
बिहार का अगला मुख्यमंत्री वही होगा जिस पर RSS की मुहर लगेगी और फिलहाल वह मुहर सम्राट के नाम पर नहीं है।
सम्राट चौधरी कोईरी-कुशवाहा समुदाय से आते हैं जो ओबीसी वर्ग में आता है। यह समुदाय बिहार में राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन जातीय समीकरण अकेले सीएम की कुर्सी तय नहीं करते। संघ और बीजेपी हाईकमान की स्वीकृति भी जरूरी होती है।
3. विजय चौधरी का बयान – सबसे बड़ा सुराग
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम बयान वरिष्ठ जेडीयू नेता विजय चौधरी का है। उन्होंने साफ कहा, ‘सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया चल रही है… और सीएम तय करना बीजेपी का काम है।’
इस एक बयान ने सबकुछ स्पष्ट कर दिया। गेंद पूरी तरह बीजेपी के पाले में है। इसका सीधा मतलब यह है कि न निशांत कुमार (नीतीश के बेटे) और न ही जेडीयू का कोई अन्य नेता। बिहार का अगला सीएम बीजेपी कोटे से आएगा।
नीतीश कुमार की बार्गेनिंग पावर अब उतनी नहीं रही जितनी कभी थी। अगर उनके पास ताकत होती, तो वो जेडीयू से किसी को आगे बढ़ाते। लेकिन आज स्थिति उलट है।
4. नीतीश भी नहीं चाहेंगे सम्राट को सीएम, जदयू का ‘लव-कुश’ समीकरण दांव पर
एक और पेचीदा पहलू है जिसे समझना जरूरी है। जेडीयू की पूरी चुनावी ताकत ‘लव-कुश’ यानी कुर्मी और कुशवाहा समीकरण पर टिकी है। अगर सम्राट सीएम बनते हैं, तो कुशवाहा समाज का नेतृत्व पूरी तरह उनके पास चला जाएगा।
तब जेडीयू का कोर वोट बैंक क्या बचेगा? उपेंद्र कुशवाहा भी कभी नहीं चाहेंगे कि ऐसा हो, क्योंकि उसके बाद उनकी राजनीतिक जमीन ही खिसक जाएगी।
इसीलिए नीतीश कुमार खुद भी भीतर से सम्राट की सीएम पारी के पक्ष में नहीं हैं। कोई अपने पैर पर कुल्हाड़ी क्यों मारेगा?
5. शिवराज सिंह चौहान: बीजेपी का पर्यवेक्षक और एक खास संदेश
अब आता है सबसे दिलचस्प मोड़। बीजेपी ने बिहार के लिए शिवराज सिंह चौहान को पर्यवेक्षक नियुक्त किया है। वही तय करेंगे कि बिहार का अगला सीएम कौन बनेगा।
लेकिन यहां एक बात ध्यान से समझिए, शिवराज सिंह चौहान राजपूत नहीं हैं। वो किरार समुदाय से आते हैं जो ओबीसी श्रेणी में आता है। बीजेपी ने जानबूझकर ओबीसी पृष्ठभूमि वाले नेता को पर्यवेक्षक बनाया है।
इससे एक साफ इशारा निकलता है कि बिहार में ओबीसी राजनीति को केंद्र में रखते हुए एक ऐसा फैसला होगा जो सबको चौंका सकता है।
6. बीजेपी का ‘मोहन यादव फॉर्मूला’ – क्या बिहार में भी रिपीट होगा?
बीजेपी के पैटर्न को समझना जरूरी है। मध्यप्रदेश में जब शिवराज सिंह खुद पर्यवेक्षक बने थे, तो उन्होंने किसी पूर्व मुख्यमंत्री या बड़े चेहरे को नहीं, बल्कि मोहन यादव जैसे अपेक्षाकृत नए चेहरे को आगे करके सबको हैरान कर दिया था।
राजस्थान में भी यही हुआ। राजनाथ सिंह पर्यवेक्षक थे, और जब चर्चा सबसे ज्यादा वसुंधरा राजे की थी, तब अचानक भजन लाल शर्मा का नाम सामने आया और सब चौंक गए।
बिहार में वही स्क्रिप्ट रिपीट हो सकती है। जो नाम सबसे ज्यादा चल रहा है, जरूरी नहीं कि वही फाइनल हो।
शिवराज का पैटर्न यह है कि वो आखिरी वक्त पर एक ऐसा नाम सामने रख देते हैं जिसकी किसी को उम्मीद नहीं होती। और वह नाम आमतौर पर वही होता है जिस पर संघ की सहमति पहले से बन चुकी होती है।
7. श्रेयसी सिंह – अचानक सुर्खियों में आया एक नाम
इसी संदर्भ में श्रेयसी सिंह का नाम अचानक तेजी से उभरा है। ओलंपियन और पूर्व खिलाड़ी से विधायक बनी श्रेयसी सिंह के नाम पर संघ की बैठक में गंभीर चर्चा हुई है।
उनका नाम कई मायनों में फिट बैठता है। वो राजपूत समुदाय से हैं लेकिन उनकी छवि एक खिलाड़ी और युवा नेता की है। वो बीजेपी की नई पीढ़ी की पहचान हो सकती हैं।
हालांकि यह भी उतना ही सच है कि उनके नाम पर अभी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन जिस तरह से संघ की बैठक में उनके नाम पर चर्चा हुई, वह अपने आप में बड़ा संकेत है।
फैसला पटना में नहीं, कहीं और लिखा जा रहा है
कुल मिलाकर तस्वीर यह है कि बिहार में सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। नीतीश कुमार धीरे-धीरे पीछे हट रहे हैं। जेडीयू के हाथ में कुछ खास नहीं बचा। बीजेपी का हाईकमान और संघ मिलकर अगले मुख्यमंत्री का नाम तय करेंगे।
सम्राट चौधरी फिलहाल रेस में पीछे हैं। संघ की बैठक में नाम नहीं, दिल्ली की बैठक कैंसिल और नीतीश का उन्हें आगे बढ़ाने में खुद का स्वार्थ नहीं।
श्रेयसी सिंह और कुछ अन्य नाम अचानक सामने आए हैं। शिवराज सिंह चौहान का पर्यवेक्षक बनना बताता है कि बीजेपी एक ‘सरप्राइज फॉर्मूला’ लाने वाली है।
जो दिख रहा है वह जरूरी नहीं कि होगा। जो होगा वो शायद किसी को दिखाई नहीं दे रहा। बिहार का खेल अभी शुरू हुआ है।
परमबीर सिंह | Bihar News Today | 1 अणे मार्ग, पटना से ग्राउंड रिपोर्ट