BNT Desk: दिल्ली की एक अदालत ने केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के खिलाफ दायर मानहानि की एक याचिका को खारिज करते हुए एक ऐसे शब्द का इस्तेमाल किया है, जिसकी चर्चा पूरे देश में हो रही है। राउज एवेन्यू कोर्ट ने इस याचिका को ‘फ्लोक्सीनाउसिनीहिलिपिलिफिकेशन’ (Floccinaucinihilipilification) करार दिया और मामले में आगे की किसी भी कार्रवाई से साफ इनकार कर दिया। बेंगलुरु की एक अदालत में इलेक्टोरल बॉन्ड (चुनावी बॉन्ड) से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान इस भारी-भरकम शब्द का जिक्र आया।
सोशल मीडिया से लेकर कानूनी गलियारों तक लोग अब इस शब्द का मतलब और इसके पीछे की कहानी ढूंढ रहे हैं। आइए समझते हैं कि आखिर यह जादुई जैसा दिखने वाला शब्द है क्या और इसका इस्तेमाल क्यों किया गया।
आखिर क्या है ‘Floccinaucinihilipilification’?
सबसे पहले इस शब्द को टुकड़ों में तोड़कर समझते हैं। यह अंग्रेजी भाषा के सबसे लंबे गैर-तकनीकी शब्दों में से एक माना जाता है। इसमें कुल 29 अक्षर (Letters) हैं।
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अर्थ: सरल भाषा में इसका मतलब होता है— “किसी चीज़ को पूरी तरह से बेकार या महत्वहीन समझने की आदत या क्रिया।”
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उत्पत्ति: यह शब्द 18वीं शताब्दी में लैटिन भाषा के चार शब्दों (floccus, nauci, nihilum, pilus) को जोड़कर बनाया गया था, जिनका व्यक्तिगत रूप से अर्थ ‘तुलना में कुछ नहीं’ या ‘बेकार’ होता है।
क्या था मामला और किसने की थी शिकायत?
यह मानहानि की शिकायत आम आदमी पार्टी (AAP) नेता सोमनाथ भारती की पत्नी लिपिका मित्रा द्वारा दायर की गई थी। लिपिका मित्रा का आरोप था कि 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान निर्मला सीतारमण ने उनके खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियां की थीं।
शिकायत के अनुसार, वित्त मंत्री ने टेलीविजन और सोशल मीडिया पर लाइव चर्चा के दौरान सोमनाथ भारती के वैवाहिक विवाद, घरेलू हिंसा के आरोपों और एक पत्रकार से जुड़े पुराने मामले का जिक्र किया था। लिपिका मित्रा का दावा था कि इन बयानों से उनकी छवि को नुकसान पहुँचा है।
कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए क्या कहा?
राउज एवेन्यू कोर्ट के एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट पारस दलाल ने इस मामले की गहनता से जांच की। कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि यह शिकायत आपराधिक मानहानि के मानकों को पूरा नहीं करती है।
अदालत की मुख्य टिप्पणियां:
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राजनीतिक चर्चा का हिस्सा: कोर्ट ने पाया कि प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान दिए गए बयान दो राजनीतिक दलों के बीच चल रही चर्चा और आलोचना का हिस्सा थे।
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निजी हमला नहीं: मजिस्ट्रेट ने कहा कि निर्मला सीतारमण का उद्देश्य विपक्षी पार्टियों की कार्यशैली पर सवाल उठाना था। उन्होंने महिलाओं की सुरक्षा और प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर कई उदाहरण दिए थे, जिनका लहजा राजनीतिक था, न कि किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ निजी हमला।
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तथ्यों की कमी: कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि पेश किए गए सबूतों में इतना दम नहीं है कि मानहानि का केस चलाया जाए। मजिस्ट्रेट ने इसी संदर्भ में ‘फ्लोक्सीनाउसिनीहिलिपिलिफिकेशन’ शब्द का इस्तेमाल करते हुए कहा कि एक बेहद मामूली और बेमतलब की बात को जरूरत से ज्यादा खींचने की कोशिश की गई है।
बिहार की राजनीति और न्यायिक फैसलों का असर
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब देश और विशेष रूप से बिहार में राजनीतिक सरगर्मी तेज है। जहाँ एक तरफ पटना में 14 अप्रैल को नीतीश कुमार के इस्तीफे और नई सरकार के गठन की चर्चाएं हैं, वहीं दूसरी ओर दिल्ली की अदालतों के ऐसे कड़े फैसले नेताओं को सार्वजनिक मंचों पर संभलकर बोलने की नसीहत भी देते हैं।
जिस तरह पटना में अडानी बनाम अग्रवाल के बीच जेपी सीमेंट नीलामी का विवाद कानूनी बारीकियों में फंसा है, उसी तरह निर्मला सीतारमण का यह केस भी ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ और ‘मानहानि’ की बारीक लकीर पर टिका था, जिसे कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है।
पारदर्शिता और कानून
दिल्ली कोर्ट के इस फैसले ने यह साफ कर दिया है कि राजनीतिक बहसों के दौरान दिए गए बयानों को तब तक मानहानि नहीं माना जा सकता, जब तक कि वे किसी व्यक्ति की गरिमा को दुर्भावनापूर्ण तरीके से ठेस न पहुँचाएं। साथ ही, ‘Floccinaucinihilipilification’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल ने यह भी दिखा दिया कि भारतीय न्यायपालिका अब वैश्विक स्तर की शब्दावली के साथ अपने फैसलों को और अधिक प्रभावशाली बना रही है।