BNT Desk: बांग्लादेश में 12 फरवरी 2026 को होने वाले आम चुनावों से ठीक पहले माहौल काफी तनावपूर्ण हो गया है। शेख हसीना की सरकार गिरने और उनकी पार्टी ‘अवामी लीग’ के चुनाव से बाहर होने के बाद, यह देश का पहला बड़ा चुनावी मुकाबला है। लेकिन इस बीच अमेरिका ने बांग्लादेश में रह रहे हिंदुओं, बौद्धों और ईसाइयों जैसे धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर गंभीर चेतावनी जारी की है। विशेषज्ञों का मानना है कि वहां कट्टरपंथी ताकतें फिर से सिर उठा रही हैं, जिससे न केवल बांग्लादेश बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की स्थिरता पर खतरा मंडरा रहा है।
वॉशिंगटन में विशेषज्ञों की बड़ी चेतावनी
हाल ही में वॉशिंगटन के ‘रेबर्न हाउस ऑफिस बिल्डिंग’ में एक महत्वपूर्ण ब्रीफिंग हुई। इसमें शामिल शिक्षाविदों और पत्रकारों ने दो टूक शब्दों में कहा कि बांग्लादेश इस समय एक बेहद नाजुक मोड़ पर खड़ा है। अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ फेलो माइकल रूबिन ने साफ कहा कि किसी भी देश में लोकतंत्र कितना मजबूत है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जाता है कि वहां अल्पसंख्यकों के साथ कैसा व्यवहार हो रहा है। रूबिन ने चेतावनी दी कि बांग्लादेश में धार्मिक स्वतंत्रता के हालात दिन-ब-दिन बिगड़ते जा रहे हैं, जिस पर दुनिया को तुरंत ध्यान देने की जरूरत है।
जमात-ए-इस्लामी को बताया गया ‘आतंकवादी संगठन’
इस चर्चा के दौरान कट्टरपंथी संगठन ‘जमात-ए-इस्लामी’ की भूमिका पर कड़े सवाल उठाए गए। माइकल रूबिन ने कहा कि जमात-ए-इस्लामी कोई सामान्य राजनीतिक दल नहीं, बल्कि एक आतंकवादी संगठन है जो धर्म का इस्तेमाल केवल जवाबदेही से बचने और लोगों को भड़काने के लिए करता है। उन्होंने अमेरिकी सरकार की भी आलोचना की और कहा कि दक्षिण एशिया को लेकर अमेरिका का रवैया सिर्फ ‘प्रतिक्रिया देने’ वाला रहा है, जबकि उसे अब सक्रिय होकर कड़े कदम उठाने चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि वहां होने वाली हिंसा को अक्सर अस्पष्ट भाषा में छिपाने की कोशिश की जाती है।
क्या खतरे में है लोकतंत्र की वैधता?
भू-राजनीतिक विश्लेषक एडेल नाजरियन ने इस चुनाव को केवल बांग्लादेश का घरेलू मामला मानने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि जब किसी प्रमुख पार्टी (जैसे अवामी लीग) को जबरदस्ती चुनावी प्रक्रिया से बाहर कर दिया जाता है, तो समाज में एक खतरनाक संदेश जाता है। इससे यह डर पैदा होता है कि अब सत्ता का फैसला लोगों के वोट से नहीं बल्कि बाहुबल और ताकत से होगा। फिलहाल, बांग्लादेश की सीमाओं पर डर का साया है और पूरी दुनिया की नजरें 12 फरवरी को होने वाले मतदान पर टिकी हैं कि क्या वहां वाकई शांतिपूर्ण चुनाव हो पाएंगे।