28 साल बाद बॉर्डर पर लौटा देशभक्ति का तूफान, सनी देओल ने फिर हिलाया परदा

‘बॉर्डर 2’ 1971 की जंग को भव्य अंदाज़ में पेश करती है। सनी देओल की दमदार मौजूदगी, वरुण-दिलजीत की शानदार परफॉर्मेंस और बेहतरीन सिनेमेटोग्राफी फिल्म की ताकत हैं। लंबाई और कुछ दोहराव के बावजूद फिल्म देशभक्ति का ज़ोरदार अनुभव देती है।

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BNT Desk: लगभग 28 साल बाद आखिरकार ‘बॉर्डर 2’ सिनेमाघरों में दस्तक दे चुकी है। साल 1997 में आई ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘बॉर्डर’ के इस सीक्वल का फैंस को बेसब्री से इंतज़ार था। जेपी दत्ता के प्रोडक्शन और अनुराग सिंह के निर्देशन में बनी यह फिल्म फिर से हमें 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध की याद दिलाती है। 3 घंटे 20 मिनट की यह लंबी फिल्म आपको कुर्सी से बांधे रखने का माद्दा रखती है। अगर आप सनी देओल के ‘ढाई किलो के हाथ’ और उनकी कड़क आवाज़ के फैन हैं, तो यह फिल्म आपके लिए किसी ट्रीट से कम नहीं है। कर्नल फतेह सिंह कलेर के रोल में सनी ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि स्क्रीन प्रेजेंस के मामले में उनका कोई मुकाबला नहीं है।

वरुण, दिलजीत और अहान: तिकड़ी ने जीता दिल

इस बार फिल्म की कहानी को तीन अलग-अलग नजरियों से दिखाया गया है। जहाँ वरुण धवन ने मेजर होशियार सिंह दहिया के रोल में अपनी अब तक की सबसे बेहतरीन परफॉर्मेंस दी है, वहीं दिलजीत दोसांझ ने वायु सेना के फ्लाइंग ऑफिसर के रूप में अपनी सहज एक्टिंग से सबका दिल जीत लिया है। वरुण और मेधा राणा की केमिस्ट्री भी काफी प्यारी लगती है। अहान शेट्टी ने भी भारतीय नौसेना के ऑफिसर के तौर पर अच्छा काम किया है, हालांकि उनका ट्रैक बाकी दोनों के मुकाबले थोड़ा कमज़ोर नज़र आता है। मोना सिंह और सोनम बाजवा ने छोटे लेकिन मजबूत किरदारों के साथ फिल्म में जान फूँक दी है।

कहानी और सिनेमेटोग्राफी की चमक

फिल्म का पहला हिस्सा जवानों की ट्रेनिंग और उनकी निजी जिंदगी की भावनाओं पर आधारित है, जो आपको किरदारों से जोड़ देता है। फिल्म की सिनेमेटोग्राफी वाकई शानदार है, खासकर युद्ध के मैदान की तबाही और टैंकों वाले सीन काफी असली लगते हैं। फिल्म के इंटरवल तक आप पूरी तरह कहानी में डूब जाते हैं। मेकर्स ने वीएफएक्स (VFX) और बजट का दिल खोलकर इस्तेमाल किया है, जो परदे पर साफ़ दिखाई देता है। तीनों सेनाओं—थल, जल और नभ—के तालमेल को जिस तरह से दिखाया गया है, वह इस फिल्म की असली रीढ़ है।

क्या है फिल्म की कमज़ोर कड़ी?

इतनी खूबियों के बाद भी फिल्म के सेकंड हाफ में युद्ध के सीन थोड़े औसत लग सकते हैं। कहीं-कहीं ऐसा महसूस होता है कि हमने इस तरह का ‘वॉर सिनेमा’ पहले भी देखा है, जिससे कहानी में थोड़ा दोहराव नज़र आता है। फिल्म की लंबाई (3 घंटे 20 मिनट) की वजह से बीच में आपको थोड़ा धैर्य रखना पड़ सकता है। हालांकि, फिल्म का क्लाइमैक्स एक बार फिर आपकी दिलचस्पी बढ़ा देता है और आपको जोश से भर देता है। कुल मिलाकर, 3.5 रेटिंग वाली यह फिल्म देशभक्ति के जज्बे से भरपूर है और इसे एक बार थिएटर में देखना तो बनता है।

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