दिव्यांगता को मात देकर IIT पटना के मानवेंद्र सिंह ने UPSC ESE में छापी ऑल इंडिया 112वीं रैंक

बुलंदशहर के मानवेंद्र सिंह ने सेरेब्रल पाल्सी जैसी बीमारी के बावजूद UPSC ESE 2025 में 112वीं रैंक हासिल की है। पेंसिल पकड़ने में असमर्थता से लेकर पहले प्रयास में IIT पटना के बाद UPSC क्रैक करने तक का उनका सफर बेहद प्रेरणादायक है।

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BNT Desk: बुलंदशहर के 24 वर्षीय मानवेंद्र सिंह ने साबित कर दिया है कि अगर मन में कुछ कर गुजरने का जज़्बा हो, तो शारीरिक अक्षमता भी रास्ता नहीं रोक सकती। हाल ही में 17 दिसंबर 2025 को घोषित संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के इंजीनियरिंग सर्विसेज एग्जामिनेशन (ESE) के नतीजों में मानवेंद्र ने ऑल इंडिया 112वीं रैंक हासिल की है. खास बात यह है कि उन्होंने यह सफलता अपने पहले ही प्रयास में पाई है, जो उनकी कड़ी मेहनत और अटूट संकल्प को दर्शाता है।

सेरेब्रल पाल्सी जैसी बड़ी चुनौती से मुकाबला

मानवेंद्र के लिए यह सफर आसान नहीं था, क्योंकि वे बचपन से ही ‘सेरेब्रल पाल्सी’ नामक एक न्यूरोलॉजिकल बीमारी से जूझ रहे हैं। यह बीमारी शरीर के चलने-फिरने और मांसपेशियों पर बुरा असर डालती है। उनकी मां रेनू सिंह, जो खुद एक स्कूल प्रिंसिपल हैं, बताती हैं कि बचपन में मानवेंद्र को एक पेंसिल पकड़ने तक में बहुत दिक्कत होती थी। रोजमर्रा के छोटे-छोटे कामों के लिए भी उन्हें दूसरों से कहीं ज्यादा संघर्ष करना पड़ता था, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी।

IIT पटना से इंजीनियरिंग और फिर UPSC का सपना

मानवेंद्र हमेशा से एक मेधावी छात्र रहे हैं। उन्होंने अपनी स्कूली पढ़ाई बुलंदशहर के खालसा पब्लिक स्कूल और मॉडर्न पब्लिक स्कूल से पूरी की। इसके बाद उन्होंने JEE एडवांस्ड में 63 रैंक लाकर सबको चौंका दिया और IIT पटना से बीटेक किया। 2024 में ग्रेजुएशन पूरा करने के तुरंत बाद वे दिल्ली चले गए और इंजीनियरिंग सर्विसेज की तैयारी के लिए कोचिंग ज्वाइन की। उनकी मेहनत रंग लाई और उन्होंने अपनी दिव्यांगता को अपने सपनों के बीच नहीं आने दिया।

युवाओं के लिए प्रेरणा बनी मानवेंद्र की कहानी

मानवेंद्र सिंह की यह कहानी आज के युवाओं के लिए एक मिसाल है। जहाँ लोग छोटी समस्याओं से घबरा जाते हैं, वहीं मानवेंद्र ने अपनी शारीरिक चुनौतियों को अपनी आदत बना लिया और उसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। उनका मानना है कि अगर हौसले बुलंद हों, तो दुनिया की किसी भी चुनौती को पार किया जा सकता है। आज उनकी इस सफलता से न केवल उनका परिवार, बल्कि पूरा बुलंदशहर गर्व महसूस कर रहा है।

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