BNT Desk: हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने हाल ही में शिक्षा और सरकारी नौकरियों से जुड़ा एक बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अगर किसी यूनिवर्सिटी ने आपकी मास्टर डिग्री को पीएचडी में एडमिशन के लिए सही माना है, तो वह उसी डिग्री को नौकरी देने के समय ‘अमान्य’ करार नहीं दे सकती। न्यायमूर्ति संदीप शर्मा की अदालत ने यह आदेश डॉ. वाई.एस. परमार यूनिवर्सिटी (सोलन) के एक मामले की सुनवाई के दौरान दिया।
क्या है पूरा मामला?
यह पूरा विवाद सीमा शर्मा नाम की एक याचिकाकर्ता से जुड़ा है, जो यूनिवर्सिटी में गेस्ट फैकल्टी के तौर पर पढ़ा रही थीं। साल 2022 में यूनिवर्सिटी ने ‘असिस्टेंट प्रोफेसर’ (फॉरेस्ट प्रोडक्ट्स) के पदों पर भर्ती निकाली। सीमा ने इसके लिए आवेदन किया, लेकिन जब मेरिट लिस्ट आई तो वह हैरान रह गईं। यूनिवर्सिटी ने उन्हें उनकी ‘एमएससी बॉटनी’ की डिग्री के लिए कोई अंक (marks) नहीं दिए थे। यूनिवर्सिटी का तर्क था कि उनके पास ‘फॉरेस्ट प्रोडक्ट्स’ में मास्टर डिग्री नहीं है, इसलिए उनकी बॉटनी की डिग्री को इस पद के लिए नहीं गिना जाएगा।
यूनिवर्सिटी के दोहरे मापदंड पर कोर्ट की फटकार
सीमा शर्मा के वकील संजीव भूषण ने कोर्ट में दलील दी कि इसी यूनिवर्सिटी ने सीमा की ‘एमएससी बॉटनी’ डिग्री को आधार मानकर उन्हें ‘फॉरेस्ट्री’ में पीएचडी करने की अनुमति दी थी। इतना ही नहीं, जब उन्हें गेस्ट फैकल्टी बनाया गया था, तब भी इसी डिग्री के अंक जोड़े गए थे। न्यायमूर्ति संदीप शर्मा ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि जब यूनिवर्सिटी ने खुद ‘बॉटनी’ को पीएचडी के लिए एक सहायक (Allied) विषय माना था, तो अब नौकरी के समय वह अपना नजरिया कैसे बदल सकती है? कोर्ट ने इसे यूनिवर्सिटी का दोहरा रवैया बताया।
कोर्ट का आदेश और उम्मीदवारों को राहत
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि साक्षात्कार समिति (Interview Committee) के पास डिग्री के अंक काटने का कोई ठोस कारण नहीं था। अदालत ने यूनिवर्सिटी को निर्देश दिया है कि वह असिस्टेंट प्रोफेसर के रिक्त पद के लिए याचिकाकर्ता की उम्मीदवारी पर दोबारा विचार करे और उन्हें उनकी एमएससी डिग्री के लिए निर्धारित अंक प्रदान करे। इस फैसले से उन हजारों छात्रों को बड़ी राहत मिली है जो अक्सर यूनिवर्सिटी के नियमों के फेर में फंसकर अपनी योग्यता खो देते हैं।