BNT Desk: नई दिल्ली: देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की म्यूचुअल फंड कंपनी ‘एसबीआई फंड्स मैनेजमेंट’ का आईपीओ (IPO) आने से पहले ही चर्चा में है। लेकिन ताज़ा खबर निवेश की दुनिया में हलचल मचा देने वाली है। खबर है कि सिटी ग्रुप और जेपी मॉर्गन जैसे दुनिया के दिग्गज विदेशी बैंकों ने इस 1.4 बिलियन डॉलर (लगभग 11,000 करोड़ रुपये) के बड़े आईपीओ से खुद को अलग कर लिया है। इन बैंकों ने इस मेगा डील को छोड़ने का फैसला इसलिए किया है क्योंकि उन्हें कंपनी की तरफ से दी जाने वाली फीस बहुत ही कम लग रही है।
सिर्फ 0.01% फीस पर फंसा मामला
जानकारी के अनुसार, इस आईपीओ में हिस्सा बेचने वाले विक्रेता (SBI और फ्रांस की कंपनी Amundi SA) बैंकों को इश्यू साइज का केवल 0.01 प्रतिशत फीस के तौर पर ऑफर कर रहे थे। अगर इसे आसान भाषा में समझें, तो बैंकों को इस भारी-भरकम काम के बदले मिलने वाला पैसा बहुत मामूली था। एलएसईजी (LSEG) के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर कंपनियां आईपीओ लाने के लिए बैंकों को औसतन 1.6% से 1.8% तक की फीस देती हैं। बैंकों का मानना है कि इतनी कम फीस में इतने बड़े ट्रांजेक्शन की जिम्मेदारी उठाना उनके लिए फायदे का सौदा नहीं है।
किन-किन दिग्गजों ने बनाई दूरी?
शुरुआत में इस आईपीओ के लिए सिटी ग्रुप, एचएसबीसी (HSBC), बैंक ऑफ अमेरिका और जेपी मॉर्गन जैसे बड़े नामों को सलाह देने के लिए चुना गया था। लेकिन फीस के मुद्दे पर असहमति के कारण अब ये बैंक पीछे हट गए हैं। हालांकि, घरेलू ब्रोकरेज हाउस और बैंक जैसे कोटक महिंद्रा कैपिटल, एक्सिस बैंक, एसबीआई कैपिटल मार्केट्स, मोतीलाल ओसवाल और आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज अभी भी इस प्रोजेक्ट से जुड़े हुए हैं। फिलहाल इस पूरे मामले पर न तो स्टेट बैंक और न ही इन विदेशी बैंकों ने कोई आधिकारिक बयान जारी किया है।
क्या होगा आम निवेशकों पर असर?
एसबीआई फंड्स में एसबीआई और फ्रांस की कंपनी अमुंडी (Amundi) की बराबर की हिस्सेदारी है। ये दोनों मिलकर अपनी 10 प्रतिशत हिस्सेदारी आईपीओ के जरिए बेचने की तैयारी में हैं। हालांकि विदेशी दिग्गजों के हटने से आईपीओ की ब्रांडिंग पर थोड़ा असर पड़ सकता है, लेकिन भारतीय ब्रोकरेज हाउसेस के साथ होने से इसकी प्रक्रिया जारी रहेगी। निवेशकों की नज़र अब इस बात पर है कि बिना इन बड़े विदेशी बैंकों के, एसबीआई इस आईपीओ को बाज़ार में कैसे उतारता है और इसका रिस्पॉन्स कैसा रहता है।