BNT Desk: बिहार के भागलपुर में गंगा नदी पर बना विक्रमशिला सेतु इस वक्त अपनी बदहाली के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। पूर्वी बिहार, कोसी और सीमांचल के करोड़ों लोगों के लिए जीवनरेखा माना जाने वाला यह पुल अब खुद अपनी सुरक्षा के लिए जूझ रहा है। विशेष रूप से पिलर नंबर 16 से 20 के बीच की स्थिति इतनी संवेदनशील हो गई है कि राहगीरों और स्थानीय लोगों के बीच डर का माहौल है।
पिलर नंबर 16 का सुरक्षा कवच ‘जमींदोज’
पुल की मजबूती के लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं उसके पिलर और उन्हें सुरक्षित रखने वाली प्रोटेक्शन वॉल (सुरक्षा दीवार)। वर्तमान में स्थिति यह है कि पिलर संख्या 160 (तकनीकी क्रम में 16) की सुरक्षा दीवार पूरी तरह से ध्वस्त होकर गंगा में समा चुकी है। इसके अलावा, दो अन्य पिलरों की दीवारें भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हैं। स्थिति इतनी नाजुक है कि यह कहना मुश्किल है कि कब कोई बड़ा हिस्सा ढह जाए। गंगा की लहरों का सीधा प्रहार अब सीधे पिलरों पर हो रहा है, जो किसी भी बड़े हादसे को न्योता दे रहा है।
मेंटेनेंस के नाम पर खानापूर्ति और घोर लापरवाही
स्थानीय लोगों का आरोप है कि विक्रमशिला सेतु पर सालों भर मरम्मत का काम चलता रहता है। करोड़ों रुपये रखरखाव के नाम पर खर्च किए जाते हैं, लेकिन धरातल पर परिणाम शून्य हैं। जब पुल के पास अलग-अलग टीमें मेंटेनेंस के लिए तैनात हैं, तो फिर पिलर इस कदर असुरक्षित कैसे हो गए?
पुल निर्माण निगम की इस कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं:
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क्या मेंटेनेंस केवल फाइलों और कागजों तक सीमित है?
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गंगा के तेज बहाव और बड़े जहाजों (Steamers) की संभावित टक्कर को देखते हुए ठोस उपाय क्यों नहीं किए गए?
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सुरक्षा दीवार गिरने के बाद भी तत्काल युद्धस्तर पर काम क्यों नहीं शुरू हुआ?
अगुवानी-सुल्तानगंज हादसे से भी नहीं ली सीख
बिहार पहले ही अगुवानी-सुल्तानगंज पुल जैसे बड़े हादसों का दंश झेल चुका है, जिसने पूरे देश में बिहार के इंफ्रास्ट्रक्चर की साख पर सवालिया निशान लगा दिया था। उस हादसे से सीख लेने के बजाय, विक्रमशिला सेतु के मामले में भी वैसी ही सुस्ती दिखाई जा रही है। अधिकारियों की अनुपलब्धता और इस मुद्दे पर चुप्पी यह संकेत देती है कि विभाग किसी बड़ी त्रासदी का इंतजार कर रहा है।
करोड़ों लोगों की धड़कनें तेज
विक्रमशिला सेतु सिर्फ एक पुल नहीं, बल्कि उत्तर और दक्षिण बिहार को जोड़ने वाला एकमात्र मुख्य मार्ग है। रोजाना हजारों की संख्या में भारी वाहन और लाखों लोग इस पर सफर करते हैं। यदि इस पुल को कुछ होता है, तो न केवल परिवहन व्यवस्था ठप हो जाएगी, बल्कि सीमांचल और पूर्वी बिहार का संपर्क देश के अन्य हिस्सों से बुरी तरह प्रभावित होगा।
जवाबदेही तय होना जरूरी
गंगा का तेज जलस्तर और सुरक्षा दीवार का न होना एक खतरनाक संयोजन है। पुल निर्माण निगम और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को अपनी कुंभकर्णी नींद से जागना होगा। जनता के टैक्स के पैसों का बंदरबांट बंद कर, पिलरों के प्रोटेक्शन वॉल का पुनर्निर्माण तुरंत शुरू किया जाना चाहिए। इससे पहले कि विक्रमशिला सेतु इतिहास का एक दुखद हिस्सा बने, सरकार को इस पर कड़ा संज्ञान लेना होगा।