बिहार ने न्याय के क्षेत्र में एक नया इतिहास रच दिया है। अब बिहार के न्यायालयों में उन अपराधियों का भी ट्रायल (मुकदमा) हो सकेगा जो पुलिस को चकमा देकर फरार चल रहे हैं। ‘ट्रायल इन अब्सेंटिया’ यानी अपराधी की अनुपस्थिति में मुकदमा चलाने वाला बिहार देश का पहला राज्य बन गया है। नए कानून (BNSS) के तहत लागू इस फैसले का सीधा मतलब यह है कि अब अपराधी भागकर सजा से नहीं बच पाएंगे।
क्यों पड़ी इस नए कानून की जरूरत?
अक्सर देखा जाता है कि गंभीर अपराध करने के बाद आरोपी जान-बूझकर कोर्ट की सुनवाई में नहीं आते। इससे मामले सालों-साल लटके रहते हैं और पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पाता। गृह विभाग के मुताबिक, इसी देरी को खत्म करने के लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 355 के तहत यह प्रावधान किया गया है। अब अगर कोई अपराधी खुद को छिपा रहा है, तो कोर्ट उसकी मौजूदगी के बिना ही केस की सुनवाई पूरी कर उसे सजा सुना सकती है।
अदालत कब और कैसे शुरू करेगी कार्रवाई?
यह प्रक्रिया इतनी आसान भी नहीं है कि किसी पर भी लागू हो जाए। विभागीय सूत्रों के अनुसार, कोर्ट पहले यह पक्का करेगी कि आरोपी जान-बूझकर बाधा डाल रहा है। इसके लिए आरोपी के खिलाफ कम से कम दो बार गिरफ्तारी वारंट जारी होना जरूरी है। अगर वह फिर भी पेश नहीं होता, तो अखबारों में विज्ञापन दिया जाएगा, रिश्तेदारों को खबर दी जाएगी और उसके घर पर नोटिस चिपकाया जाएगा। इन सब औपचारिकताओं के बाद ही ‘ट्रायल इन अब्सेंटिया’ शुरू होगा।
सजा के बाद क्या मिलेगा अपील का मौका?
बिहार के अपर मुख्य सचिव (गृह विभाग) अरविंद कुमार चौधरी ने बताया कि लंबित मामलों को जल्द निपटाने के लिए यह क्रांतिकारी कदम है। हालांकि, कानून में आरोपी के अधिकारों का भी ध्यान रखा गया है। अगर सजा सुनाए जाने के बाद आरोपी कोर्ट में पेश होता है, तो उसे दोबारा सुनवाई या अपील करने का मौका मिल सकता है। लेकिन अब अपराधी सिस्टम को और ज्यादा परेशान नहीं कर सकेंगे, क्योंकि उनकी गैर-हाजिरी में भी इंसाफ का पहिया घूमता रहेगा।