महज 2 मिनट की देरी और साल भर की मेहनत बर्बाद: रोहतास में परीक्षा केंद्र के बाहर बिलखते रहे छात्र

ट्रैफिक जाम के कारण इंटर परीक्षा केंद्र पहुंचने में हुई 2 मिनट की देरी ने छात्रों का साल बर्बाद कर दिया। हाथ जोड़ने और पैरों में गिरने के बावजूद प्रशासन ने एंट्री नहीं दी, जिससे परीक्षार्थी फूट-फूटकर रोने लगे। बदहाल ट्रैफिक व्यवस्था ने बच्चों की साल भर की मेहनत पर पानी फेर दिया।

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BNT Desk: बिहार में इंटरमीडिएट की परीक्षा के पहले ही दिन एक ऐसा मंजर देखने को मिला जिसने सबका दिल दहला दिया। रोहतास जिले के डेहरी स्थित रामारानी जैन स्कूल में महज 1-2 मिनट की देरी ने कई छात्र-छात्राओं का भविष्य दांव पर लगा दिया। समय बीत जाने के बाद पहुंचे परीक्षार्थियों को गेट के अंदर एंट्री नहीं दी गई, जिसके बाद छात्र केंद्र के बाहर ही फूट-फूटकर रोने लगे।

हाथ जोड़े, पैरों में गिरे, फिर भी नहीं पसीजा प्रशासन

परीक्षा केंद्र के बाहर का नजारा बेहद भावुक कर देने वाला था। छात्राएं गेट पर तैनात पुलिसकर्मियों और मजिस्ट्रेट के पैरों में गिरकर अंदर जाने की भीख मांगती रहीं। कुछ छात्राएं हाथ जोड़कर दरवाजा पीटती रहीं कि उन्हें बस एक मौका दिया जाए, क्योंकि उन्होंने पूरे साल इस दिन के लिए कड़ी मेहनत की थी। कुछ ने दूसरे रास्तों से अंदर घुसने की कोशिश भी की, लेकिन सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें पकड़कर बाहर निकाल दिया। अधिकारियों ने साफ कह दिया कि नियम सबके लिए बराबर हैं और देरी होने पर किसी को छूट नहीं दी जा सकती।

जाम बना जी का जंजाल: प्रशासन पर फूटा गुस्सा

छात्रों ने अपनी इस देरी का जिम्मेदार शहर के ट्रैफिक जाम को बताया है। परीक्षार्थियों का कहना था कि डेहरी की मुख्य सड़कों पर सुबह से ही भीषण जाम लगा था, जिसकी वजह से वे समय पर नहीं पहुंच सके। छात्रों और उनके माता-पिता ने जिला प्रशासन पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर परीक्षा के दिन ट्रैफिक व्यवस्था सही होती, तो आज उनका साल बर्बाद नहीं होता। अभिभावकों का आरोप है कि प्रशासन की लापरवाही की कीमत बच्चों को अपने करियर से चुकानी पड़ रही है।

भविष्य की चिंता और टूटता हौसला

एंट्री न मिलने से मायूस छात्राएं केंद्र के बाहर घंटों बैठी रहीं। आंखों में आंसू लिए एक छात्रा ने बताया, “हमारी पूरी मेहनत बेकार चली गई, अब हम क्या करेंगे?” मौके पर मौजूद लोगों का भी यही मानना था कि अनुशासन जरूरी है, लेकिन प्रशासन को थोड़ा मानवीय रुख अपनाना चाहिए था। इस घटना ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या नियमों की सख्ती छात्रों के भविष्य से ज्यादा बड़ी है? फिलहाल, इन छात्रों का एक साल अब बर्बाद होने की कगार पर है।

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