Patna ISBT बना 400 करोड़ी विकास का ‘सफेद हाथी’, सुशासन के दावों की खुली पोल

Parambir Singh
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Parambir Singh एक पत्रकार और डिजिटल मीडिया रणनीतिकार हैं, जो बिहार की राजनीति और जमीनी मुद्दों पर लिखते हैं। वे स्पष्ट और तथ्य आधारित विश्लेषण के...
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पटना, बैरिया: बिहार की राजधानी पटना के बैरिया में स्थित ‘पाटलिपुत्र अंतर्राज्यीय बस टर्मिनल’ (ISBT) को जब 2020 में जनता को समर्पित किया गया था, तब इसे बिहार के बुनियादी ढांचे के लिए एक मील का पत्थर बताया गया था। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ को लेकर बड़े-बड़े दावे किए गए थे कि अब बिहार के यात्रियों को एयरपोर्ट जैसी सुख-सुविधाएं मिलेंगी। लेकिन आज, चार साल बाद, यह 400 करोड़ का प्रोजेक्ट विकास के नाम पर एक ‘कलंक’ और भ्रष्टाचार का प्रतीक नजर आता है।

Patna ISBT में करोड़ों का निवेश, पर सुविधाओं के नाम पर ‘सन्नाटा’

करीब 26 एकड़ में फैले इस विशाल बस टर्मिनल की हकीकत यह है कि यहाँ की भव्य इमारतें यात्रियों के लिए नहीं, बल्कि धूल और मकड़ी के जालों के लिए सुरक्षित रखी गई हैं। ग्राउंड रिपोर्ट में पाया गया कि पार्किंग के लिए बनाई गई बड़ी-बड़ी मंजिलों पर एक भी गाड़ी नजर नहीं आती। यात्रियों के बैठने के लिए जो ब्लॉक ‘ए’ और ‘बी’ बनाए गए थे, उनमें ताले लटके हुए हैं। आलम यह है कि करोड़ों की लागत से लगाए गए लिफ्ट और आधुनिक एक्सलरेटर (स्वचालित सीढ़ियाँ) बंद पड़े हैं। बिना इस्तेमाल के ही ये मशीनें अब कबाड़ में तब्दील हो रही हैं।

patna isbt
पटना ISBT का बंद पड़ा अंडरग्राउंड सड़क

यात्री ब्लॉक पर पुलिस का ‘कब्जा’

हैरानी की बात यह है कि जहाँ यात्रियों को बस का इंतज़ार करने के लिए आरामदायक कुर्सियाँ और डिजिटल डिस्प्ले मिलना चाहिए था, वहाँ अब बिहार पुलिस के जवान डेरा जमाए हुए हैं। ऐसा लगता है कि बिहार परिवहन विभाग ने भी यह मान लिया है कि वह इस टर्मिनल को सुचारू रूप से चलाने में अक्षम है, इसीलिए इस सार्वजनिक संपत्ति को पुलिस छावनी में बदल दिया गया है। यात्री बाहर चिलचिलाती धूप और गंदगी के बीच बस का इंतज़ार करने को मजबूर हैं।

patna isbt ground report
जहां पर दौड़नी चाहिए बस… वह सुनसान पड़ा

भ्रष्टाचार की गूँज: “200 करोड़ जेब में गए”

टर्मिनल पर मौजूद यात्रियों और स्थानीय लोगों में सरकार के प्रति भारी आक्रोश है। ग्राउंड जीरो पर बातचीत के दौरान एक यात्री ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “यह ढांचा 400 करोड़ का तो कहीं से नहीं लगता। शायद 200 करोड़ में काम हुआ है और बाकी 200 करोड़ नेताओं और अधिकारियों की जेब में गए हैं।” जगह-जगह से टूटते शीशे और दीवारों से झड़ता प्लास्टर इस आरोप को बल देते हैं। निर्माण की गुणवत्ता इतनी खराब है कि कई जगहों पर शीशे टूटने के बाद उन्हें बदलने के बजाय टिन की चादरें लगा दी गई हैं ताकि अंदर की बदहाली को ढका जा सके।

कनेक्टिविटी का अभाव और यात्रियों की ‘लूट’

आईएसबीटी को शहर से दूर बैरिया में बसाने का सबसे बड़ा नुकसान यात्रियों को हो रहा है। पटना जंक्शन से यहाँ आने के लिए कोई व्यवस्थित सरकारी बस सेवा या सस्ती कनेक्टिविटी नहीं है। यात्रियों ने शिकायत की कि ऑटो चालक उनसे 100 से 150 रुपये तक वसूल रहे हैं। इसके अलावा, टर्मिनल के भीतर सुविधाओं के नाम पर भी लूट मची है। शौचालय के बाहर सरकारी रेट 5 रुपये लिखा है, लेकिन यात्रियों से कथित तौर पर 20 रुपये तक वसूले जा रहे हैं।

गंदगी और बदबू का साम्राज्य

टर्मिनल के निचले हिस्सों (Underground Area) की स्थिति और भी भयावह है। जलजमाव और कचरे की वजह से वहां से इतनी तेज बदबू आती है कि सांस लेना मुश्किल है। जिस जगह को बस स्टैंड की ‘लाइफलाइन’ होना चाहिए था, वह आज बीमारियों का घर बन चुकी है। बस चालकों का कहना है कि पुराने मीठापुर बस स्टैंड में कम से कम व्यवस्था तो थी, यहाँ तो सड़कों पर गड्ढे और गंदगी के कारण गाड़ियों के टायर और कलपुर्जे तक खराब हो रहे हैं।

किसका ड्रीम प्रोजेक्ट?

नीतीश कुमार अब राज्यसभा जा चुके हैं, लेकिन उनके कार्यकाल का यह ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ आज अपनी बदहाली की कहानी खुद कह रहा है। 400 करोड़ रुपये जो बिहार की जनता के टैक्स की गाढ़ी कमाई थी, वह आज अधिकारियों की लापरवाही और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण कीचड़ में बह रही है। क्या बिहार सरकार इस कुव्यवस्था की जिम्मेदारी लेगी, या यह टर्मिनल यूं ही भ्रष्टाचार के स्मारक के रूप में खड़ा रहेगा?

पटना से परमबीर सिंह की रिपोर्ट 

यहां देखें ग्राउंड रिपोर्ट –

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Parambir Singh एक पत्रकार और डिजिटल मीडिया रणनीतिकार हैं, जो बिहार की राजनीति और जमीनी मुद्दों पर लिखते हैं। वे स्पष्ट और तथ्य आधारित विश्लेषण के लिए जाने जाते हैं और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर प्रभावी कंटेंट निर्माण का अनुभव रखते हैं।