BNT Desk: बिहार के मेडिकल शिक्षा जगत में इस वक्त सनसनी मची हुई है। आरोप लग रहे हैं कि IGIMS में एमबीबीएस और पीजी फाइनल ईयर की परीक्षाओं में बड़े पैमाने पर धांधली की गई है। सूत्रों के मुताबिक, यह पूरा खेल एक ‘रेट कार्ड’ के आधार पर चल रहा था। पेपर लीक कराने से लेकर, परीक्षा की कॉपियों को बाहर से लिखवाकर सिस्टम में सेट करने तक के अलग-अलग दाम तय थे। लाखों रुपये के लेन-देन के जरिए अयोग्य छात्रों को डॉक्टर बनाने की यह कथित साजिश मेडिकल पेशे की गरिमा पर एक बड़ा प्रहार है।
निदेशक की रहस्यमयी छुट्टी और सियासी गलियारे में चर्चा
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब संस्थान के निदेशक डॉ. बिंदे अचानक लंबी छुट्टी पर चले गए। उनकी यह गैर-मौजूदगी कई गंभीर सवालों को जन्म दे रही है। सियासी चर्चा यह भी है कि डॉ. बिंदे, जो बिहार राज्य स्वास्थ्य एवं विज्ञान विश्वविद्यालय में एडहॉक कुलपति (VC) का जिम्मा भी संभाल रहे हैं, सत्ता के बेहद करीब माने जाते हैं।
चूंकि इस विश्वविद्यालय के कुलपति की नियुक्ति राज्यपाल नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री करते हैं, इसलिए यह कयास लगाए जा रहे हैं कि अपनी ‘स्थायी नियुक्ति’ की जुगत में लगे निदेशक कहीं इस घोटाले को दबाने की कोशिश तो नहीं कर रहे?
एक ईमेल से खुला राज, लेकिन 28 दिनों तक रही खामोशी
हैरानी की बात यह है कि इस घोटाले की सूचना एक बेनाम ईमेल के जरिए 13 मार्च को ही दे दी गई थी। ईमेल में परीक्षा में होने वाली हेरफेर की पूरी जानकारी थी। लेकिन करीब चार हफ्तों (28 दिनों) तक फाइलों पर धूल जमती रही और कोई कार्रवाई नहीं की गई। जब मामला मीडिया और सियासी गलियारों में उछला, तब जाकर प्रशासन की नींद खुली और आनन-फानन में एक जांच कमेटी का गठन किया गया।
जांच कमेटी पर भी उठे सवाल: अपनों को बचाया जा रहा?
प्रभारी निदेशक सह डीन डॉ. ओम कुमार की अध्यक्षता में चार सदस्यीय जांच टीम बनाई गई है, जिसमें डॉ. संजय कुमार, डॉ. ज्ञान भाष्कर और डॉ. अश्विनी शामिल हैं। लेकिन इस कमेटी की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे हैं। संस्थान के प्रिंसिपल डॉ. रंजीत गुहा, जिनके अधिकार क्षेत्र में परीक्षाएं आती हैं, उन्हें इस जांच से पूरी तरह दूर रखा गया है। डॉ. गुहा ने खुद इस पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि उन्हें जांच प्रक्रिया से बाहर रखना पारदर्शिता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
CCTV फुटेज और संदिग्ध गतिविधियों के संकेत
घोटाले की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि परीक्षा शाखा के सीसीटीवी (CCTV) फुटेज में असामान्य गतिविधियों की बात सामने आ रही है। देर रात तक दफ्तरों का खुलना और संदिग्ध लोगों का आना-जाना यह इशारा करता है कि पर्दे के पीछे उत्तर पुस्तिकाओं (Answer Sheets) के साथ छेड़छाड़ की गई है। खबर है कि कई आंसर शीट्स को बाहर ले जाकर लिखवाया गया और बाद में उन्हें सुरक्षित तरीके से रिकॉर्ड में शामिल कर दिया गया।
सिर्फ संस्थान ही नहीं, पूरे सिस्टम की साख दांव पर
यह पहली बार नहीं है जब IGIMS में अनियमितताओं की बात उठी है। इससे पहले भी एक प्रारंभिक जांच में कुछ संकेत मिले थे, लेकिन उसे रफा-दफा कर दिया गया। अब जब मामला एमबीबीएस और पीजी जैसी उच्च स्तरीय परीक्षाओं से जुड़ा है, तो सवाल सिर्फ एक कॉलेज पर नहीं, बल्कि पूरे बिहार के मेडिकल एजुकेशन सिस्टम पर उठ रहा है। अगर पैसे के दम पर डॉक्टर बनेंगे, तो मरीजों की जान के साथ होने वाले खिलवाड़ की जिम्मेदारी किसकी होगी?
निष्कर्ष: सात दिन और हकीकत का सामना
फिलहाल, जांच कमेटी को सात कार्य दिवसों के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपनी है। बिहार की जनता और मेडिकल छात्र यह देख रहे हैं कि क्या यह जांच वाकई दोषियों को सजा दिला पाएगी या फिर इसे भी रसूखदारों के दबाव में फाइलों में दफन कर दिया जाएगा। अगर ये इल्ज़ाम साबित होते हैं, तो यह बिहार के स्वास्थ्य विभाग के लिए एक ऐसा दाग होगा जिसे मिटाना मुश्किल होगा।
पूरी निगाहें अब राजभवन और मुख्यमंत्री आवास की ओर टिकी हैं—क्या निष्पक्ष जांच होगी? या फिर ‘सफेदपोशों’ की साख बचाने के लिए इस महाघोटाले पर पर्दा डाल दिया जाएगा?