BNT Desk: बिहार की सियासत में 8 मार्च 2026 की तारीख एक बड़े बदलाव की गवाह बनी। जहाँ तेजस्वी यादव सालों से मैदान में डटे हैं, वहीं नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार की 50 साल की उम्र में एंट्री ने मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है। आइए समझते हैं इस नई सियासी जंग के समीकरण।
निशांत बनाम तेजस्वी: विरासत की दो अलग कहानियाँ
बिहार में राजनीति अक्सर परिवारों के इर्द-गिर्द घूमती है, लेकिन इन दोनों की कहानी अलग है। तेजस्वी यादव को उनके पिता लालू प्रसाद यादव ने शुरू से ही राजनीति के लिए तैयार किया। 2015 में पहली बार चुनाव लड़ने के बाद वे डिप्टी सीएम बने और आज विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा हैं। दूसरी तरफ निशांत कुमार हैं, जो पेशे से इंजीनियर हैं और दशकों तक राजनीति से दूर रहे। नीतीश कुमार हमेशा ‘परिवारवाद’ के खिलाफ बोलते रहे, लेकिन अब निशांत की एंट्री ने विरोधियों को हमला करने का मौका दे दिया है। जेडीयू इसे नीतीश का ‘नैतिक बल’ कह रही है, जबकि विपक्ष इसे मजबूरी बता रहा है।
अनुभव और आक्रामकता: कौन किस पर भारी?
तेजस्वी यादव एक मंझे हुए खिलाड़ी की तरह बात करते हैं। नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने और भाजपा के बढ़ते प्रभाव पर उन्होंने तुरंत ‘महाराष्ट्र मॉडल’ का जिक्र कर हमला बोला। उनके पास चुनावी रैलियों और सरकार चलाने का अनुभव है। निशांत कुमार फिलहाल एक ‘क्लीन स्लेट’ हैं। उनके पास कोई प्रशासनिक या राजनीतिक अनुभव नहीं है। हालांकि, उनकी सादगी और विवादों से दूर रहना उनकी ताकत हो सकती है। चर्चा है कि वे चंपारण से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू कर सकते हैं, लेकिन बिहार की जटिल राजनीति में सिर्फ ‘नीतीश का बेटा’ होना काफी नहीं होगा।
ताकत, कमजोरी और भविष्य की राह
- तेजस्वी यादव: उनकी ताकत MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण है, लेकिन ‘जंगलराज’ का पुराना टैग उनकी कमजोरी बनी हुई है। उन्हें सत्ता तक पहुँचने के लिए इस दायरे से बाहर निकलना होगा।
- निशांत कुमार: उनके पास नीतीश कुमार के ‘सुशासन’ (सड़क, बिजली, कानून-व्यवस्था) की विरासत है। भाजपा के साथ तालमेल बिठाना और जेडीयू के पुराने दिग्गजों के बीच अपनी जगह बनाना उनके लिए बड़ी चुनौती होगी।