बिहार में पंचायत परिसीमन पर सियासी उबाल, मुखिया महासंघ ने हाई कोर्ट जाने की चेतावनी दी

बिहार में पंचायत परिसीमन पर सियासी उबाल, मुखिया महासंघ ने हाई कोर्ट जाने की चेतावनी दी

BNT
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बिहार में आगामी पंचायत चुनावों को लेकर ग्राम पंचायतों का परिसीमन (delimitation) एक बड़ा मुद्दा बन गया है। बिहार प्रदेश मुखिया महासंघ और अन्य पंचायत प्रतिनिधि संगठनों ने साफ कहा है कि यदि पंचायतों का परिसीमन चुनाव से पहले नहीं कराया गया तो वे पटना हाई कोर्ट का रुख करेंगे। महासंघ का कहना है कि बिना परिसीमन के चुनाव चुनावी नियमों के खिलाफ होगा और इससे पंचायत चुनावों की वैधता पर सवाल उठेंगे। महासंघ ने इस मांग को लेकर पटना में आयोजित राज्य स्तरीय बैठक में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया है।

परिसीमन क्यों आवश्यक?

परिसीमन का मतलब ग्राम पंचायतों के क्षेत्रों और वार्डों की सीमा तय करना है ताकि प्रत्येक क्षेत्र में आबादी के हिसाब से सही प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके। मुखिया महासंघ का तर्क है कि पिछला परिसीमन काफी समय पहले हुआ था और तब से ग्राम पंचायतों की आबादी और भौगोलिक परिवर्तन काफी बढ़ चुके हैं। इससे कुछ पंचायतों में आबादी ज्यादा और कुछ में कम हो गई है, जिससे चुनाव में असंतुलन पैदा हो सकता है। महासंघ ने कहा है कि ऐसे में पुराने परिसीमन के आधार पर चुनाव कराना उचित नहीं है।

राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ और प्रशासनिक स्थिति

पंचायतों के परिसीमन को लेकर राजनीतिक हलचल भी तेज हो गई है। विभिन्न पंचायत प्रतिनिधि संगठनों ने मिलकर अधिकारियों से अपील की है कि वे शीघ्र ही परिसीमन प्रक्रिया शुरू करें। महासंघ का कहना है कि यदि सरकार ने अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया, तो वे हाई कोर्ट में याचिका दाखिल करेंगे ताकि अदालत के निर्देश से परिसीमन कराया जा सके। स्थानीय नेताओं का मानना है कि सही परिसीमन के बिना चुनाव राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर विवाद का कारण बन सकता है।

चुनावी तैयारी के बीच बढ़ता विवाद

बिहार में पंचायत चुनावों के आयोजन को लेकर अन्य बड़े मुद्दों पर भी चर्चा जारी है, जैसे आरक्षण के नियमों का नया फॉर्मूला और चुनाव में ईवीएम का उपयोग। लेकिन परिसीमन विवाद इस समय पंचायत चुनाव तैयारी की प्रक्रिया का सबसे बड़ा सरोकार बन गया है। मुखिया महासंघ का मानना है कि अगर चुनाव पूर्व परिसीमन नहीं किया गया तो पंचायत चुनाव की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है, जिससे लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व कमजोर पड़ेगा।

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