रक्षक ही बने भक्षक: कटिहार में CA और बैंक मैनेजर चला रहे थे ‘म्यूल अकाउंट’ का काला खेल, ₹2 करोड़ का हुआ खुलासा!

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BNT Desk: बिहार के कटिहार से आई एक खबर ने साइबर अपराध की दुनिया का एक नया और चौंकाने वाला चेहरा सामने ला दिया है। अब तक हम साइबर ठगों को अनजान नंबरों और फर्जी कॉल तक सीमित मानते थे, लेकिन इस बार कहानी में ऐसे लोग शामिल हैं जिन पर समाज सबसे ज्यादा भरोसा करता है—एक चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) और एक बैंक मैनेजर।

ऑपरेशन प्रहार 2.0: कैसे हुआ खुलासा

बिहार पुलिस के इकोनॉमिक ऑफेंस यूनिट (EOU) ने “ऑपरेशन प्रहार 2.0” के तहत एक विशेष अभियान शुरू किया। इसका मकसद था उन बैंक खातों की पहचान करना जिनमें संदिग्ध लेनदेन हो रहा था।

इन खातों को “म्यूल अकाउंट” कहा जाता है—ऐसे खाते जो किसी आम व्यक्ति के नाम पर होते हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल साइबर ठग करते हैं।

कटिहार जिले में ऐसे 26 संदिग्ध खातों की पहचान हुई। जब पुलिस ने गहराई से जांच शुरू की, तो एक बड़ा नेटवर्क सामने आया, जिसमें कुल छह लोगों की गिरफ्तारी हुई।

CA का कनेक्शन: भरोसे से विश्वासघात

इस केस का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि गिरफ्तार आरोपियों में एक चार्टर्ड अकाउंटेंट भी शामिल है।

निशांत अग्रवाल नाम के इस CA ने अपना बैंक खाता साइबर अपराधियों को इस्तेमाल करने के लिए दे दिया। उनके साथ उनके सहयोगी रवि शंकर भी शामिल थे।

इन दोनों के खातों से करीब 50 लाख 69 हजार रुपये का लेनदेन हुआ। इतना ही नहीं, इन खातों के खिलाफ देश के अलग-अलग राज्यों—जैसे तमिलनाडु और महाराष्ट्र—में कुल 11 मामले दर्ज पाए गए।

जब पुलिस की नजर इन पर पड़ी, तो आरोपियों ने खुद थाने में जाकर झूठी रिपोर्ट दर्ज कराई कि उनकी चेकबुक और मोबाइल खो गए हैं। लेकिन पुलिस की जांच में सच्चाई सामने आ गई।

बैंक मैनेजर की भूमिका: सिस्टम के भीतर से खेल

इस मामले का दूसरा और सबसे गंभीर पहलू है एक बैंक मैनेजर की संलिप्तता।

ICICI बैंक के ब्रांच मैनेजर कौशल झा पर आरोप है कि उन्होंने इन खाताधारकों को साइबर अपराधियों से जोड़ने में मदद की।

एक अन्य आरोपी कैलाश प्रसाद साह के खाते में करीब 1 करोड़ 71 लाख रुपये का लेनदेन हुआ। इस पूरे नेटवर्क में रिंकू कुमार, राजेश कुमार मिश्रा और पूर्णिया के दो अन्य लोग भी शामिल थे।

यानी यह सिर्फ व्यक्तिगत लालच नहीं, बल्कि एक संगठित नेटवर्क था जिसमें बैंकिंग सिस्टम के अंदर के लोग भी शामिल थे।

कैसे काम करता था पूरा नेटवर्क

पुलिस जांच में सामने आया कि आरोपी अपनी लोकेशन छिपाने के लिए कोलकाता जाकर सिम कार्ड का इस्तेमाल करते थे।

पूरा सिस्टम कुछ इस तरह काम करता था:

  • खाताधारक अपना बैंक अकाउंट उपलब्ध कराते

  • साइबर ठग उस खाते में पैसे ट्रांसफर करते

  • बैंकिंग प्रक्रिया को आसान बनाने में अंदरूनी मदद मिलती

  • जरूरत पड़ने पर सबूत मिटाने के लिए झूठी शिकायत दर्ज कराई जाती

यह एक सुनियोजित नेटवर्क था, जिसमें हर व्यक्ति की एक तय भूमिका थी।

लालच की कीमत: क्यों फंसते हैं लोग?

अब सवाल उठता है—इतने पढ़े-लिखे और जिम्मेदार लोग ऐसा क्यों करते हैं?

जवाब है—आसान पैसे का लालच।
साइबर ठग खाताधारकों को कमीशन का लालच देते हैं और कहते हैं कि “आप सिर्फ खाता दीजिए, बाकी हम संभाल लेंगे।”

लेकिन लोग यह नहीं समझते कि उनके खाते से गुजरने वाला हर पैसा किसी न किसी पीड़ित की मेहनत की कमाई होती है।

कानून की नजर में ऐसे खाताधारक भी उतने ही दोषी होते हैं जितने असली ठग।

भरोसे पर सवाल और समाज के लिए सबक

इस घटना ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—जब एक CA और बैंक मैनेजर जैसे जिम्मेदार लोग ही इस तरह के अपराध में शामिल हो जाएं, तो आम आदमी किस पर भरोसा करे?

यह मामला सिर्फ अपराध का नहीं, बल्कि भरोसे के टूटने का है।

पुलिस का कहना है कि अभी सिर्फ कुछ खातों की जांच हुई है, आगे और बड़े खुलासे हो सकते हैं। यानी यह नेटवर्क और भी बड़ा हो सकता है।

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