बिहार में डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस पर रोक पर विवाद, डॉक्टरों के ग्रुप ने रखी अपनी शर्तें

बिहार सरकार सरकारी डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस पूरी तरह रोकने की योजना बना रही है। डॉक्टरों का समूह कहता है कि बिना सुविधाओं और भत्तों के नियम लागू करना गलत होगा। उन्होंने बेहतर आवास, सुरक्षा, बच्चों की पढ़ाई और नॉन-प्रैक्टिसिंग अलाउंस की मांग की है और चेतावनी दी है कि अनदेखी पर आंदोलन होगा।

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BNT Desk: बिहार सरकार अब सरकारी डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस पर पूरी तरह रोक लगाने की योजना बना रही है। सरकार के इस कदम के बाद बिहार स्वास्थ्य सेवा संघ (भंसा) भी सामने आ गया है। संघ का कहना है कि अगर सरकार यह बदलाव करना चाहती है, तो उसे पहले डॉक्टरों की बुनियादी मांगों और सुविधाओं पर ध्यान देना होगा। भंसा के प्रवक्ता डॉ. विनय कुमार ने साफ किया कि बिना ठोस रणनीति और सुविधाओं के यह फैसला डॉक्टरों के साथ अन्याय होगा।

डॉक्टरों को मिले ‘चॉइस’ और एनपीए (NPA)

भंसा ने सरकार से मांग की है कि डॉक्टरों पर कोई भी फैसला थोपने के बजाय उन्हें विकल्प (Choice) दिया जाना चाहिए। संघ के मुताबिक, जो डॉक्टर अपनी प्राइवेट प्रैक्टिस छोड़ना चाहते हैं, उन्हें सरकार की तरफ से ‘नॉन प्रैक्टिसिंग अलाउंस’ (NPA) दिया जाए। डॉक्टरों का कहना है कि किसी भी नियम को लागू करने से पहले सरकार को भंसा और डॉक्टरों की कमेटी के साथ बैठकर बातचीत करनी चाहिए, ताकि बीच का रास्ता निकाला जा सके।

AIIMS और PGI जैसी सुविधाओं की मांग

संघ का तर्क है कि अगर सरकार चाहती है कि डॉक्टर सिर्फ सरकारी अस्पतालों में ही सेवा दें, तो उन्हें एम्स (AIIMS) और पीजीआई (PGI) जैसे बड़े संस्थानों की तर्ज पर सुविधाएं भी मिलनी चाहिए। इसमें डॉक्टरों के लिए अच्छे आवास (Housing) की सुविधा और कार्यस्थल पर पुख्ता सुरक्षा शामिल है। डॉ. विनय कुमार ने कहा कि डॉक्टरों को बेहतर माहौल देना सरकार की जिम्मेदारी है, तभी वे बिना किसी तनाव के मरीजों का इलाज कर पाएंगे।

बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाए सरकार

अपनी मांगों की सूची में संघ ने एक और महत्वपूर्ण बिंदु जोड़ा है। भंसा का कहना है कि जो डॉक्टर प्रैक्टिस नहीं करेंगे, उनके बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का पूरा खर्च सरकार को वहन करना चाहिए। इसके अलावा कार्यस्थल पर अन्य बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित करना भी अनिवार्य है। डॉक्टरों का मानना है कि इन सुविधाओं के बिना नया नियम लागू करना जल्दबाजी होगी और इससे चिकित्सा व्यवस्था पर बुरा असर पड़ सकता है।

आंदोलन की दी चेतावनी

डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि अगर सरकार ने बिना किसी व्यापक अध्ययन (Study) और बिना उनकी मांगों पर विचार किए इसे लागू किया, तो राज्य के डॉक्टरों को मजबूरन आंदोलन का रास्ता चुनना पड़ेगा। संघ ने साफ कर दिया है कि वे मरीजों के हित में हैं, लेकिन डॉक्टरों के अधिकारों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अब देखना यह है कि स्वास्थ्य विभाग डॉक्टरों की इन मांगों पर क्या रुख अपनाता है।

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