बिहार की राजनीति में इन दिनों एक नई गर्माहट है। विधानसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन के बाद कांग्रेस के भीतर यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या राजद के साथ बना पुराना गठबंधन अब बोझ बन चुका है। कई स्थानीय नेताओं का मानना है कि जनता तक कांग्रेस की अपनी पहचान और मजबूत संदेश नहीं पहुँच पा रहा है क्योंकि पार्टी हर बार राजद की छाया में दब जाती है। नतीजों ने इस बेचैनी को और गहरा कर दिया है।
कांग्रेसी पदाधिकारियों का तर्क है कि चुनाव से पहले सीटों पर देर से सहमति, स्थानीय स्तर पर तालमेल की कमी और कुछ जगहों पर दोनों दलों की प्रतिद्वंद्विता ने पूरे गठबंधन की छवि को कमजोर किया। उनका कहना है कि अगर पार्टी स्वतंत्र रणनीति अपनाती, तो कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भी बढ़ती और मतदाताओं को सीधा नेतृत्व दिखाई देता।
राजद नेतृत्व की ओर से संकेत है कि वह गठबंधन को लेकर दबाव में नहीं है। उनकी दलील है कि साझेदारी तभी टिकती है जब दोनों दल एक-दूसरे की ताकत को स्वीकार करें। अगर कांग्रेस अलग रास्ता अपनाना चाहती है, तो राजद उसे रोकने की कोशिश नहीं करेगा। यह बयानबाज़ी राजनीतिक गलियारों में कई तरह की अटकलें पैदा कर रही है।
कांग्रेस हाईकमान फिलहाल स्थिति पर नजर बनाए हुए है। पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेता मानते हैं कि जल्दबाज़ी में फैसला लेना ठीक नहीं होगा, क्योंकि बिहार में विपक्ष की एकता भी महत्वपूर्ण है। वहीं युवा नेतृत्व चाहता है कि संगठन को नयी दिशा और साफ पहचान दी जाए—चाहे इसके लिए गठबंधन की रूपरेखा बदलनी पड़े।
राजनीतिक माहौल गर्म है, और आने वाले महीनों में तय होगा कि दोनों दल साथ चलेंगे या अलग-अलग अपनी ताकत आजमाएँगे। इतना जरूर है कि वर्तमान स्थितियों ने गठबंधन को नए मोड़ पर खड़ा कर दिया है।