स्वास्थ्य विभाग का बड़ा फैसला: बिहार में सरकारी डॉक्टरों की ‘प्राइवेट प्रैक्टिस’ पर पूर्ण रोक, जानें मरीजों को कैसे होगा फायदा

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BNT Desk: बिहार सरकार ने अपने महत्वाकांक्षी ‘सात निश्चय-3’ कार्यक्रम के तहत स्वास्थ्य क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन का मन बना लिया है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा पेश किए गए प्रस्ताव पर राज्य कैबिनेट ने अपनी सहमति दे दी है। इस संबंध में विभाग ने आधिकारिक संकल्प (Official Resolution) भी जारी कर दिया है। यह आदेश उन सभी एलोपैथिक डॉक्टरों और चिकित्सक शिक्षकों पर तत्काल प्रभाव से लागू होगा जो सरकारी सेवा में कार्यरत हैं और वेतन ले रहे हैं।

किन पर लागू होगी यह रोक?

सरकार का यह सख्त आदेश निम्नलिखित संवर्गों (Cadres) के डॉक्टरों पर लागू होगा:

  1. बिहार स्वास्थ्य सेवा संवर्ग: राज्य के विभिन्न सदर अस्पतालों, अनुमंडलीय अस्पतालों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) में कार्यरत डॉक्टर।

  2. बिहार चिकित्सा शिक्षा सेवा संवर्ग: सभी सरकारी मेडिकल कॉलेजों (जैसे PMCH, NMCH, DMCH आदि) के प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर।

  3. इंदिरा गांधी हृदय रोग संस्थान (IGIC) चिकित्सा सेवा संवर्ग: पटना स्थित इस प्रतिष्ठित दिल के अस्पताल के विशेषज्ञ डॉक्टर।

यानी अब कोई भी सरकारी डॉक्टर अपनी ड्यूटी के बाद या दौरान निजी क्लिनिक, नर्सिंग होम या किसी कॉर्पोरेट अस्पताल में प्रैक्टिस नहीं कर पाएगा।

क्यों लिया गया यह सख्त फैसला? मरीजों की परेशानी होगी दूर

सरकार के इस निर्णय के पीछे मुख्य उद्देश्य सरकारी अस्पतालों की साख को बहाल करना और गरीब मरीजों को बेहतर इलाज मुहैया कराना है।

  • डॉक्टरों की अनुपलब्धता: अक्सर यह शिकायत मिलती थी कि सरकारी डॉक्टर अपनी ड्यूटी के घंटों में भी निजी क्लीनिकों में व्यस्त रहते हैं। इससे सरकारी अस्पतालों में ओपीडी (OPD) और इमरजेंसी सेवाओं पर बुरा असर पड़ता था।

  • मरीजों को रेफर करने का खेल: कई बार डॉक्टर सरकारी अस्पताल में आए मरीजों को बेहतर इलाज का झांसा देकर अपने निजी क्लीनिक पर रेफर कर देते थे, जिससे मरीजों पर आर्थिक बोझ बढ़ता था।

  • बेहतर निगरानी: इस रोक के बाद सरकार डॉक्टरों की उपस्थिति और उनके काम की बेहतर निगरानी कर सकेगी।

डॉक्टरों को मिलेगा ‘नॉन-प्रैक्टिसिंग अलाउंस’ (NPA)

प्राइवेट प्रैक्टिस पर रोक लगाने के साथ ही सरकार ने डॉक्टरों के आर्थिक हितों का भी ध्यान रखा है। सरकार ने साफ किया है कि इस रोक के बदले डॉक्टरों को गैर-व्यवसायिक भत्ता (Non-Practicing Allowance – NPA) या प्रोत्साहन राशि दी जाएगी। यह भत्ता उनके मूल वेतन का एक निश्चित प्रतिशत होगा।

  • गाइडलाइन जल्द: स्वास्थ्य विभाग ने कहा है कि NPA की राशि और इसके भुगतान से जुड़ी विस्तृत गाइडलाइन सक्षम प्राधिकारी (Competent Authority) की मंजूरी के बाद अलग से जारी की जाएगी।

अस्पतालों की बदलेगी सूरत, बढ़ेगा जनता का विश्वास

इस फैसले से बिहार के स्वास्थ्य ढांचे में बड़े बदलाव की उम्मीद है:

  • 24×7 उपलब्धता: डॉक्टरों के निजी प्रैक्टिस न करने से वे सरकारी अस्पतालों में ज्यादा समय दे पाएंगे, जिससे मरीजों को चौबीसों घंटे विशेषज्ञ डॉक्टरों की सेवाएं मिल सकेंगी।

  • ग्रामीण क्षेत्रों को फायदा: प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की उपस्थिति बढ़ने से ग्रामीण आबादी को इलाज के लिए शहर भागने की जरूरत कम होगी।

  • मेडिकल शिक्षा में सुधार: मेडिकल कॉलेजों के शिक्षकों के पूरा समय कॉलेज में देने से भावी डॉक्टरों की पढ़ाई और रिसर्च वर्क (Research Work) में भी सुधार आएगा।

स्वास्थ्य क्रांति की ओर बढ़ता बिहार

बिहार सरकार का यह फैसला निस्संदेह राज्य में ‘स्वास्थ्य क्रांति’ की दिशा में एक बड़ा कदम है। यद्यपि कुछ डॉक्टर संगठन इसका विरोध कर सकते हैं, लेकिन आम जनता ने इस निर्णय का स्वागत किया है। यदि सरकार NPA की गाइडलाइन समय पर जारी करती है और इस रोक को कड़ाई से लागू करती है, तो बिहार के सरकारी अस्पतालों की सूरत सचमुच बदल सकती है और ‘गरीबों को मुफ्त और बेहतर इलाज’ का सपना सच हो सकता है।

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