बिहार में इन दिनों राजस्व विभाग को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। राज्य के अंचल कार्यालयों में काम करने वाले राजस्व कर्मचारी—जिनमें सीओ (CO), आरओ (RO) और अंचल के अन्य कर्मचारी शामिल हैं—हड़ताल पर चले गए हैं। कर्मचारियों का मानना था कि हड़ताल से सरकार पर दबाव बनेगा और उनकी मांगें मान ली जाएंगी।
लेकिन सरकार की प्रतिक्रिया बिल्कुल अलग रही। सरकार ने साफ संदेश दिया कि यदि कर्मचारी काम नहीं करेंगे तो व्यवस्था को रोकने के बजाय वैकल्पिक व्यवस्था लागू कर दी जाएगी। इसी फैसले ने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया है।
हड़ताल की वजह क्या है?
राजस्व कर्मचारियों का कहना है कि वे लंबे समय से अपनी मांगों को लेकर सरकार से गुहार लगा रहे हैं। उनकी प्रमुख मांगों में सेवा शर्तों में सुधार, पदोन्नति की स्पष्ट और पारदर्शी व्यवस्था तथा वेतन से जुड़ी विसंगतियों को दूर करना शामिल है।
कर्मचारियों का आरोप है कि वर्षों से उन्हें आश्वासन तो मिलता रहा, लेकिन ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इसी कारण उन्होंने सामूहिक हड़ताल का रास्ता चुना।
हड़ताल का समय भी रणनीतिक रूप से चुना गया। मार्च का महीना राजस्व विभाग के लिए सबसे व्यस्त समय माना जाता है। जमीन से जुड़े अधिकांश काम—जैसे दाखिल-खारिज, मापी और परिमार्जन—इसी समय बड़ी संख्या में किए जाते हैं। कर्मचारियों को उम्मीद थी कि ऐसे समय में हड़ताल से सरकार पर दबाव पड़ेगा।
सरकार का पलटवार
हालांकि सरकार ने इस हड़ताल को अलग तरीके से लिया। बिहार के उपमुख्यमंत्री और राजस्व मंत्री Vijay Kumar Sinha ने स्पष्ट निर्देश जारी कर दिए कि राज्य के 537 अंचल कार्यालयों का काम वैकल्पिक व्यवस्था से कराया जाएगा।
सरकार ने फैसला किया कि अब अंचल कार्यालयों से जुड़े कई काम बीडीओ (BDO) और पंचायत सचिव के जरिए कराए जाएंगे। इसके लिए डिजिटल मॉड्यूल तैयार किए गए हैं, जिनके माध्यम से दाखिल-खारिज, परिमार्जन और ई-मापी जैसे कार्य किए जा सकेंगे।
हर प्रखंड में डिजिटल ऑपरेटर तैनात करने की योजना भी बनाई गई है। साथ ही, बीडीओ और पंचायत सचिवों को प्रशिक्षण देने का काम शुरू कर दिया गया है। जिलाधिकारियों को पूरी व्यवस्था की निगरानी का निर्देश दिया गया है और मंत्रालय स्तर पर भी मॉनिटरिंग की बात कही गई है।
सरकार का संदेश साफ है—हड़ताल से जनता का काम नहीं रुकने दिया जाएगा।
कितने काम लंबित हैं?
राजस्व विभाग के आंकड़ों के अनुसार बिहार में हर दिन औसतन करीब 5,500 दाखिल-खारिज और लगभग 1,050 मापी से जुड़े आवेदन आते हैं।
राज्य में पहले से ही बड़ी संख्या में मामले लंबित हैं। बताया जाता है कि करीब 40 लाख से अधिक म्यूटेशन और लगभग 5 लाख मापी के मामले विभिन्न अंचल कार्यालयों में लंबित पड़े हैं।
यानी समस्या नई नहीं है। हड़ताल ने सिर्फ उस पुरानी समस्या को और उजागर कर दिया है जो पहले से मौजूद थी।
क्या यह बड़ा बदलाव साबित होगा?
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सरकार ने पहली बार अंचल कार्यालयों की पारंपरिक व्यवस्था को चुनौती देने वाला कदम उठाया है।
यदि बीडीओ और पंचायत सचिव के जरिए डिजिटल सिस्टम से जमीन से जुड़े काम सुचारु रूप से होने लगते हैं, तो संभव है कि भविष्य में यही व्यवस्था स्थायी रूप से लागू कर दी जाए।
ऐसा हुआ तो अंचल कार्यालयों में सीओ और आरओ के पारंपरिक अधिकारों में बड़ा बदलाव आ सकता है।
भूमि सर्वेक्षण पर भी असर?
राज्य में चल रहा भूमि सर्वेक्षण भी इस विवाद से जुड़ा हुआ है। बिहार सरकार का लक्ष्य दिसंबर 2027 तक भूमि सर्वेक्षण का काम पूरा करना है।
हड़ताल का इस प्रक्रिया पर क्या असर पड़ा है, इसकी समीक्षा के लिए अधिकारियों की बैठक भी बुलाई गई है।
आगे क्या होगा?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हड़ताल कर रहे कर्मचारी सरकार से बातचीत कर काम पर लौटेंगे या टकराव और बढ़ेगा।
सरकार की नई व्यवस्था अगर जमीन पर सफल होती है, तो यह बिहार के राजस्व प्रशासन में लंबे समय से चले आ रहे ढांचे में बड़ा बदलाव ला सकती है।
आने वाले दिनों में यह साफ हो जाएगा कि यह विवाद सिर्फ एक हड़ताल तक सीमित रहता है या फिर अंचल कार्यालयों की कार्यप्रणाली में स्थायी परिवर्तन की शुरुआत बन जाता है।