Bihar – Jharkhand में BJP को लगा बड़ा झटका, Bengal में भी साइड इफेक्ट?

Parambir Singh
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बिहार में प्रचंड जीत के बाद भारतीय जनता पार्टी का अगला बड़ा लक्ष्य पश्चिम बंगाल माना जा रहा था। पार्टी के भीतर यह संदेश साफ था कि बिहार के बाद अब नजर बंगाल पर है। लेकिन इसी बीच एक ऐसा विवाद सामने आया जिसने राजनीतिक समीकरणों को उलझा दिया — यूजीसी की नई गाइडलाइन।

यूजीसी यानी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा जारी नई गाइडलाइन पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल रोक लगा दी है, लेकिन राजनीतिक हलकों में बहस जारी है। सवर्ण समाज के एक हिस्से में नाराजगी देखी जा रही है, वहीं ओबीसी और एससी-एसटी संगठनों की ओर से इसे लागू करने की मांग की जा रही है। इस खींचतान का राजनीतिक असर क्या है — इसकी झलक हालिया चुनावी नतीजों में देखने को मिल रही है।

झारखंड में क्या हुआ?

झारखंड में हाल ही में नगर निकाय चुनाव हुए। चुनाव भले ही औपचारिक रूप से दलगत आधार पर नहीं थे, लेकिन सभी प्रमुख दलों ने अपने समर्थित उम्मीदवारों के पक्ष में खुलकर प्रचार किया। भाजपा के कई राष्ट्रीय स्तर के नेता मैदान में डटे रहे।

लेकिन नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे। 9 नगर निगमों में से केवल 3 जगह ही भाजपा समर्थित उम्मीदवार मेयर पद जीत पाए, जबकि 6 सीटों पर हार का सामना करना पड़ा। हजारीबाग जैसे शहर, जिसे भाजपा का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है, वहां भी मतदान प्रतिशत में गिरावट दर्ज की गई। बताया जा रहा है कि पिछली बार की तुलना में लगभग 5 प्रतिशत कम वोट पड़े।

पटना यूनिवर्सिटी का संकेत

दूसरा बड़ा संकेत पटना से आया। Patna University छात्रसंघ चुनाव में इस बार अप्रत्याशित परिणाम सामने आया। भाजपा की छात्र इकाई Akhil Bharatiya Vidyarthi Parishad (एबीवीपी) को बड़ा झटका लगा और कांग्रेस समर्थित National Students’ Union of India (एनएसयूआई) ने अध्यक्ष और महासचिव पद पर जीत दर्ज की।

करीब 50 साल बाद और 1980 के बाद पहली बार एनएसयूआई ने अध्यक्ष पद जीता। शांतनु शेखर अध्यक्ष बने और खुशी कुमारी महासचिव। एबीवीपी को सिर्फ संयुक्त सचिव पद से संतोष करना पड़ा।

यह परिणाम इसलिए भी अहम है क्योंकि पटना यूनिवर्सिटी को लंबे समय से एबीवीपी का गढ़ माना जाता रहा है। राज्य में सत्ता में रहने वाली पार्टी की छात्र इकाई का इस तरह हारना राजनीतिक विश्लेषकों के लिए चर्चा का विषय बन गया है।

कम वोटिंग — बड़ा संकेत?

पटना यूनिवर्सिटी छात्रसंघ चुनाव में इस बार केवल 37.84 प्रतिशत मतदान हुआ, जबकि पिछली बार यह आंकड़ा 45.25 प्रतिशत था। यानी करीब 7.5 प्रतिशत की गिरावट। झारखंड के नगर निकाय चुनाव में भी कई जगह मतदान प्रतिशत कम रहा।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कोर वोटबेस का एक हिस्सा नाराज होकर घर बैठ जाए, तो इसका सीधा असर नतीजों पर पड़ता है। कई जगहों पर कार्यकर्ताओं के उत्साह में कमी की चर्चा भी सामने आई।

बंगाल पर असर?

अब बड़ा सवाल यही है — क्या यह असंतोष सिर्फ स्थानीय चुनावों तक सीमित रहेगा या पश्चिम बंगाल जैसे बड़े चुनावी रण तक पहुंचेगा?

West Bengal भाजपा के लिए एक रणनीतिक राज्य है। यदि कोर वोटबेस में भ्रम या नाराजगी बनी रहती है, तो इसका असर संगठनात्मक ऊर्जा और मतदान प्रतिशत पर पड़ सकता है। हालांकि राजनीति में समीकरण तेजी से बदलते हैं और अंतिम परिणाम कई कारकों पर निर्भर करते हैं।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद कानूनी स्थिति स्पष्ट होने का इंतजार है। लेकिन राजनीतिक स्तर पर संदेश साफ है — चुनावी जीत का सिलसिला बनाए रखने के लिए कार्यकर्ताओं का उत्साह और वोटरों की सक्रिय भागीदारी बेहद जरूरी है।

झारखंड और पटना यूनिवर्सिटी के नतीजों ने एक संकेत जरूर दिया है। अब देखना होगा कि भाजपा इस संकेत को चेतावनी मानती है या सामान्य उतार-चढ़ाव समझकर आगे बढ़ती है।

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