BNT Desk: बिहार में शराबबंदी लागू हुए कई साल बीत चुके हैं। सरकार का दावा है कि इससे समाज में सुधार हुआ है और लोग नशे से दूर हुए हैं। लेकिन जमीनी हकीकत और हालिया आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। जिस राज्य में शराब पर पूरी तरह प्रतिबंध है, वहीं अब ‘सूखे नशे’ यानी ड्रग्स का खतरा तेजी से बढ़ता नजर आ रहा है। अफीम, गांजा, हेरोइन और नशीली दवाइयों का जाल बिहार में गहराता जा रहा है। इस लेख में हम इसी बदलते नशे के ट्रेंड और उससे जुड़े सवालों को समझने की कोशिश करेंगे।
डराने वाले आंकड़े: नशे का बढ़ता ग्राफ
हाल के वर्षों में बिहार में ड्रग्स से जुड़े मामलों में भारी उछाल देखने को मिला है। आंकड़े बताते हैं कि पिछले तीन सालों में अफीम की जब्ती 16 गुना तक बढ़ गई है।
जहां साल 2023 में सिर्फ 5 किलो अफीम जब्त की गई थी, वहीं 2025 में यह आंकड़ा बढ़कर 77 किलो तक पहुंच गया।
साल 2026 के शुरुआती दो महीनों—जनवरी और फरवरी—में ही पुलिस ने 7416 किलो गांजा बरामद किया है। यानी हर महीने औसतन 3700 किलो से ज्यादा गांजा बिहार में खपाने की कोशिश हो रही थी।
सिर्फ गांजा ही नहीं, नशीली सुइयों और दवाइयों का चलन भी तेजी से बढ़ा है। दो महीनों में 15,000 से ज्यादा इंजेक्शन और 50,000 से अधिक नशीली गोलियां जब्त की गईं। ये आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि नशे की मांग लगातार बढ़ रही है और इसका नेटवर्क भी मजबूत हो रहा है।
सिस्टम की नाक के नीचे: 2026 की बड़ी कार्रवाईयां
प्रशासन लगातार कार्रवाई का दावा करता है, लेकिन हालिया घटनाएं यह भी दिखाती हैं कि तस्कर कितने बेखौफ हो चुके हैं।
पटना के खगौल इलाके में हाल ही में करीब 7 करोड़ रुपये की हेरोइन और ब्राउन शुगर बरामद की गई। इससे पहले फरवरी में एक अवैध फैक्ट्री का भंडाफोड़ हुआ, जहां बड़े पैमाने पर नशीले पदार्थ और दवाइयां तैयार की जा रही थीं।
सुपौल में मकई के खेत में छिपाकर रखा गया 620 किलो गांजा पकड़ा गया, जो इस बात का सबूत है कि तस्कर अब ग्रामीण इलाकों का भी इस्तेमाल कर रहे हैं।
सबसे चौंकाने वाली घटना नालंदा जिले से सामने आई, जहां अफीम की खेती का खुलासा हुआ। परवलपुर इलाके में 8-10 कट्ठा जमीन पर अफीम उगाई जा रही थी। यह सवाल उठाता है कि जब निगरानी के लिए आधुनिक तकनीक और ड्रोन का इस्तेमाल किया जा रहा है, तब ऐसी खेती कैसे पनप रही है?
क्या शराबबंदी ने बढ़ाया ‘सूखा नशा’?
अब सबसे अहम सवाल—क्या शराबबंदी के कारण नशे का स्वरूप बदल गया है?
विशेषज्ञों और पूर्व पुलिस अधिकारियों का मानना है कि शराब पर सख्ती के कारण उसकी उपलब्धता कम और कीमत ज्यादा हो गई है। ऐसे में नशे के आदी लोग सस्ते और आसानी से मिलने वाले विकल्पों की ओर बढ़ रहे हैं, जैसे गांजा, स्मैक, चरस और नशीली दवाइयां।
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि शराबबंदी के बावजूद शराब की तस्करी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। साल 2025 में करीब 37.75 लाख लीटर शराब जब्त की गई, जिसकी कीमत लगभग 293 करोड़ रुपये आंकी गई।
इसका मतलब साफ है कि एक तरफ शराब का अवैध कारोबार जारी है और दूसरी तरफ ड्रग्स का एक नया, अधिक खतरनाक नेटवर्क खड़ा हो चुका है।
युवाओं पर सबसे बड़ा खतरा
इस पूरे संकट का सबसे ज्यादा असर बिहार के युवाओं पर पड़ रहा है।
नशीली दवाइयों और इंजेक्शन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है, जो सीधे तौर पर स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक है। इससे न सिर्फ लत लगती है, बल्कि गंभीर बीमारियों और अपराध की ओर भी युवाओं को धकेल सकता है।
अगर समय रहते इस पर रोक नहीं लगाई गई, तो यह एक सामाजिक संकट का रूप ले सकता है, जिसका असर आने वाली पीढ़ियों पर पड़ेगा।
सिस्टम से बड़े सवाल
अब सवाल यह उठता है कि जब राज्य में नारकोटिक्स कंट्रोल के लिए अलग से यूनिट है और पुलिस लगातार छापेमारी कर रही है, तो फिर ये ड्रग्स बिहार तक पहुंच कैसे रहे हैं?
क्या सीमावर्ती इलाकों पर निगरानी पर्याप्त नहीं है?
क्या प्रशासन का ध्यान शराबबंदी के कारण अन्य नशों से हट गया है?
क्या तस्करों के नेटवर्क को तोड़ने के लिए कोई ठोस रणनीति बनाई गई है?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि सिर्फ जब्ती और गिरफ्तारी से क्या समस्या का समाधान संभव है, या इसके लिए कोई लंबी रणनीति और जागरूकता अभियान की जरूरत है?
बदलता नशा, बढ़ता खतरा
बिहार में नशे का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। शराबबंदी के बाद जहां एक उम्मीद थी कि समाज नशामुक्त होगा, वहीं अब एक नया और ज्यादा खतरनाक संकट सामने आ गया है।
अगर सरकार और प्रशासन ने समय रहते सख्त और व्यापक कदम नहीं उठाए, तो ‘नशामुक्त बिहार’ का सपना अधूरा रह सकता है।
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